
छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की तैयारी पूरी हो चुकी है। 16 जून 2026 से शुरू होने वाले नए शैक्षणिक सत्र से प्रदेश के स्कूलों में प्रार्थना सभा का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। अब स्कूलों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ मंत्रोच्चार करना भी अनिवार्य होगा। सरकार का मानना है कि इस पहल से छात्रों में अनुशासन और एकाग्रता बढ़ेगी। नए नियमों के मुताबिक, स्कूल की शुरुआत दीप वंदना, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र के सामूहिक पाठ के साथ की जाएगी।
बारहखड़ी के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की शिक्षा
शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने स्पष्ट किया है कि सरकार बच्चों को पारंपरिक मूल्यों के साथ-साथ आधुनिक तकनीक से भी जोड़ना चाहती है। नए पाठ्यक्रम में अब बच्चों को शुरुआती कक्षाओं से ही बारहखड़ी के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बुनियादी जानकारी दी जाएगी। इसके लिए गूगल के विशेषज्ञ शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण देंगे। मंत्री ने बताया कि 15 अप्रैल से 15 जून तक शिक्षकों और प्राचार्यों के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाया जाएगा ताकि सत्र शुरू होते ही बच्चों को बेहतर संसाधन मिल सकें।
मिड-डे मील से पहले भी होगा मंत्रोच्चार
स्कूलों में होने वाले बदलाव केवल प्रार्थना सभा तक सीमित नहीं हैं। अब सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील यानी दोपहर का भोजन करने से पहले भी बच्चों को मंत्रों का पाठ करना होगा। सरकार ने कुल पांच मंत्रों का चयन किया है जिन्हें अनिवार्य किया गया है। शिक्षा मंत्री के अनुसार, पढ़ाई की शुरुआत मंत्रों के साथ होने से बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होगा और वे अपनी संस्कृति से जुड़ाव महसूस कर सकेंगे। यह नियम प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में कड़ाई से लागू किया जाएगा।
महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेंगे छात्र
छात्रों के चारित्रिक निर्माण के लिए हर महीने विशेष व्याख्यान आयोजित किए जाएंगे। इसके तहत जिस महीने में जिन महापुरुषों की जयंती होगी, उनके जीवन और संघर्षों पर कुछ मिनट का विशेष सत्र रखा जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को किताबी ज्ञान से हटकर एक बेहतर नागरिक बनने की प्रेरणा देना है। सहायक वाचन के पाठ्यक्रम में भी बदलाव किया गया है, जिसमें अब छत्तीसगढ़ के स्थानीय तीज-त्योहारों और लोक परंपराओं को शामिल किया गया है।
शनिवार को ‘एक्टिविटी डे’ के रूप में मनाएंगे
अभी तक शनिवार को बैगलेस डे के रूप में जाना जाता था, लेकिन अब इसे ‘एक्टिविटी डे’ के तौर पर शुरू किया जा रहा है। इस दिन स्कूलों में कोई किताबी पढ़ाई नहीं होगी। इसके बजाय बच्चों को स्थानीय खेल, योग, गार्डनिंग और हाउसकीपिंग जैसी जरूरी गतिविधियों में शामिल किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि शनिवार के दिन बच्चे शारीरिक और व्यावहारिक कौशल सीखें, जिससे स्कूल के प्रति पालकों और शिक्षकों का जुड़ाव और अधिक मजबूत हो सके।
शिक्षकों और प्रिंसिपलों को मिलेगी विशेष ट्रेनिंग
नई शिक्षा नीति और बदले हुए नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार ने प्रबंधन पर जोर दिया है। 15 अप्रैल से शुरू होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम में सभी स्कूलों के प्रिंसिपल हिस्सा लेंगे। मैनेजमेंट से लेकर तकनीकी शिक्षा तक के गुर सिखाने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं। शिक्षा मंत्री ने भरोसा दिलाया है कि 16 जून को जब बच्चा स्कूल पहुंचेगा, तो उसे उसी दिन किताबें और अन्य जरूरी संसाधन मुहैया करा दिए जाएंगे।
विपक्ष ने उठाए सवाल और जताई आपत्ति
स्कूलों में मंत्रोच्चार अनिवार्य किए जाने और प्रार्थना सभा के बदले नियमों पर प्रदेश की राजनीति गर्मा गई है। विपक्षी दलों ने सरकार के इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार शिक्षा व्यवस्था का वैचारिक और राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रही है। इसे लेकर सदन से लेकर सड़क तक बहस छिड़ गई है। हालांकि, सरकार का कहना है कि यह निर्णय केवल बच्चों के सर्वांगीण विकास और सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाने के लिए लिया गया है।



