
बिलासपुर हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क और शादीशुदा महिला अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाती है, तो उसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने एक पीड़िता द्वारा निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बरी करके सही फैसला सुनाया था, क्योंकि साक्ष्यों से सहमति की बात साफ झलक रही थी।
शादी के वादे और मजदूरी के दौरान दोस्ती
पूरा मामला बेमेतरा जिले का है, जहां एक महिला ने गांव के ही एक युवक पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया था। याचिका के अनुसार महिला एक कृषि कॉलेज में मजदूरी करने जाती थी, जहां आरोपी भी काम करता था। महिला का कहना था कि जून 2022 में आरोपी ने उससे बात शुरू की और उसे रानी की तरह रखने व शादी करने का लालच दिया। पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया था कि आरोपी ने बार-बार शादी का वादा करके उसे अपने जाल में फंसाया और संबंध बनाने का दबाव बनाया।
बिना किसी डर के महिला की रजामंदी
शिकायत के मुताबिक जुलाई 2022 की एक सुबह जब महिला घर से बाहर निकली थी, तब आरोपी ने उसे फिर से शादी का भरोसा दिलाया। महिला का आरोप था कि बिजली कटने का फायदा उठाकर आरोपी उसे अपने घर ले गया और वहां उसके साथ संबंध बनाए। महिला ने यह भी बताया कि उस वक्त वह तीन महीने की गर्भवती थी और समाज के डर से उसने तुरंत किसी को कुछ नहीं बताया। काफी समय बाद जब उसने अपने पति को इस बारे में जानकारी दी, तब जाकर पुलिस में मामला दर्ज कराया गया।
कोर्ट में मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयान
पुलिस की जांच के बाद मामला ट्रायल कोर्ट पहुंचा था। वहां गवाहों के बयानों और मेडिकल रिपोर्ट की बारीकी से जांच की गई। निचली अदालत ने पाया कि महिला को न तो जान से मारने की धमकी दी गई थी और न ही उसे किसी चोट का डर दिखाया गया था। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पीड़िता पहले से शादीशुदा थी और उसे कानून की पूरी समझ थी। इन तथ्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त कर दिया था, जिसके बाद पीड़िता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
बालिग महिला की सहमति सर्वोपरि
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि सहमति डरा-धमका कर ली गई थी। अदालत ने जोर देकर कहा कि महिला बालिग थी और अपनी मर्जी व्यक्त करने में सक्षम थी। चूंकि महिला पहले से विवाहित थी, इसलिए शादी के वादे के आधार पर भ्रम में रहने का तर्क भी कमजोर पड़ गया। कोर्ट ने अंत में फैसला सुनाया कि आपसी सहमति से बनाए गए संबंधों को कानूनन दुष्कर्म नहीं माना जा सकता और इसी के साथ याचिका को रद्द कर दिया गया।



