
CG Panchayat Sarpanch Pati Ban: छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से चली आ रही ‘सरपंच पति’ और ‘प्रधान प्रतिनिधि’ व्यवस्था को जड़ से खत्म करने के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। विभाग द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक अब त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों की जगह उनके पति, भाई, बेटे या किसी भी अन्य प्रतिनिधि के पंचायत की आधिकारिक बैठकों में बैठने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। सरकारी बैठकों में अब केवल निर्वाचित महिला सरपंचों, पंचों और जनपद सदस्यों की वास्तविक मौजूदगी अनिवार्य होगी। इस ऐतिहासिक बदलाव से गांवों की सत्ता में बड़ा फेरबदल होना तय माना जा रहा है।
कागजी नहीं जमीनी तौर पर हक दिलाना है मकसद, बाहरी दखल पर सरकार ने लगाया पूर्ण विराम
राज्य सरकार को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि कई ग्राम पंचायतों में महिलाएं चुनाव जीतकर सरपंच तो बन जाती हैं, लेकिन उनके अधिकारों का इस्तेमाल उनके परिवार के पुरुष सदस्य करते हैं। सरकारी फाइलों में दस्तखत कराने से लेकर विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और वित्तीय फैसलों तक में इन बाहरी रिश्तेदारों का सीधा हस्तक्षेप बना रहता था। पंचायत विभाग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि स्थानीय निकायों में महिलाओं को दिया गया 50 प्रतिशत का आरक्षण केवल कागजी औपचारिकता नहीं है। सरकार का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में सीधे तौर पर शामिल करना है, ताकि गांव के विकास, पानी, बिजली और राशन जैसे बुनियादी मुद्दों पर वे खुद फैसला कर सकें।
डिजिटल तकनीक से रखी जाएगी पैनी नजर, फेस रिकॉग्निशन और बायोमीट्रिक सिस्टम से होगा सत्यापन
फर्जी हाजिरी और बैठकों में होने वाली गड़बड़ियों को रोकने के लिए सरकार अब आधुनिक तकनीक का सहारा लेने जा रही है। जिला और जनपद स्तर के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे हर एक बैठक का उपस्थिति रिकॉर्ड पूरी पारदर्शिता के साथ सुरक्षित रखें। कई संवेदनशील और बड़े ग्राम पंचायतों में अब बायोमीट्रिक अटेंडेंस (अंगूठे का निशान) और फेस रिकॉग्निशन सिस्टम (चेहरा पहचानने वाली तकनीक) स्थापित करने की तैयारी की जा रही है। इस डिजिटल व्यवस्था के लागू होने से बैठकों में महिला सरपंच के नाम पर किसी और पुरुष रिश्तेदार की डमी मौजूदगी पर हमेशा के लिए लगाम लग जाएगी।
खुद फाइलों को समझेंगी महिला जनप्रतिनिधि, अफसरों से सीधे संवाद करने से बढ़ेगा आत्मविश्वास
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत विभाग के इस कड़े फैसले का जमीनी स्तर पर व्यापक और सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। जब महिला प्रतिनिधियों को अनिवार्य रूप से बैठकों में शामिल होना पड़ेगा, तो धीरे-धीरे उनका प्रशासनिक कामकाज को लेकर आत्मविश्वास बढ़ेगा। अब तक जो महिलाएं घूंघट या घरेलू व्यस्तताओं के कारण दफ्तरों से दूर रहती थीं, वे अब खुद जनपद और जिला मुख्यालय जाकर अधिकारियों से सीधे संवाद स्थापित करेंगी। इससे न केवल महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि ग्रामीण विकास की योजनाओं की जमीनी निगरानी भी अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगी।
रायपुर के अफसरों को फील्ड में उतरने के आदेश, केवल निर्वाचित जनप्रतिनिधि ही बैठ सकेंगे मुख्य चेंबर में
राजधानी रायपुर के पंचायत निदेशालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पूर्व में कई ऐसी समीक्षा बैठकें देखी गईं जहां महिला जनप्रतिनिधि पूरी तरह से नदारद रहती थीं और उनकी जगह उनके पति या देवर अधिकारियों के साथ मंच साझा करते थे। अब सरकार ने इस ढर्रे को पूरी तरह से बदल दिया है। नए नियमों के तहत अब केवल वही व्यक्ति पंचायत भवन के मुख्य चेंबर या बैठक हॉल में बैठ सकेगा, जिसे जनता ने बाकायदा मत देकर निर्वाचित किया है। इसके लिए सभी मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (सीईओ) को अपने-अपने क्षेत्रों में औचक निरीक्षण करने और नियम का उल्लंघन होने पर संबंधित पंचायत सचिव के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।



