
रायपुर: छत्तीसगढ़ में अगर आप जमीन-जायदाद, नामांतरण, बंटवारा या अन्य राजस्व संबंधी कामों को लेकर तहसील दफ्तर जाने की सोच रहे हैं, तो थोड़ा रुक जाइए। अगले कुछ दिन वहां कुछ खास काम नहीं होगा, क्योंकि प्रदेशभर के तहसीलदार और नायब तहसीलदारों ने तीन दिवसीय अवकाश लेकर विरोध प्रदर्शन की राह पकड़ ली है।
राजधानी से लेकर तहसील तक ताला, अधिकारी बोले – अब तो सुनो सरकार!
तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए साफ कह दिया है – “संसाधन नहीं, तो काम नहीं!”
राज्यभर के ये राजस्व अधिकारी अब न केवल काम से विराम ले चुके हैं, बल्कि उन्होंने सरकार के सामने अपनी 17 सूत्रीय मांगों की लिस्ट भी रख दी है, जिन पर वे लंबे समय से ध्यान दिए जाने की उम्मीद लगाए बैठे थे।
पहले भी शासन को कई बार ज्ञापन दिए गए, मांगों की याद दिलाई गई, लेकिन हर बार या तो जवाब टालमटोल वाला मिला या फिर पूरी तरह से अनसुना कर दिया गया। अब मामला गंभीर होता जा रहा है।
धरना जिला स्तर से राजधानी तक, तय किया विरोध का ट्रैक
तीन दिन के इस विरोध कार्यक्रम को लेकर तहसीलदार संघ ने रणनीति भी बना ली है:
- पहला दिन: आज जिले स्तर पर होगा धरना और प्रदर्शन।
- दूसरा दिन (मंगलवार): संभाग स्तर पर जुटेंगे राजस्व अधिकारी।
- तीसरा दिन (30 जुलाई): राजधानी रायपुर में होगा विशाल प्रदर्शन, जहां पूरे प्रदेश के तहसीलदार-नायब तहसीलदार इकट्ठा होंगे।
संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि यह आंदोलन किसी दल या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि एक बेहतर कामकाजी व्यवस्था और सम्मानजनक संसाधनों की माँग को लेकर है। वे साफ कहते हैं कि जब सिस्टम ठीक नहीं, तो सेवा कैसे देंगे?
ये हैं तहसीलदारों की प्रमुख मांगें
अब सवाल उठता है कि आखिर ये अधिकारी मांग क्या रहे हैं? तो सूत्रों के अनुसार उनकी प्रमुख मांगें कुछ इस तरह हैं:
- कार्यस्थल पर पर्याप्त संसाधन और स्टाफ की व्यवस्था।
- राजस्व अमले के लिए मूलभूत सुविधाएं और सुरक्षा।
- प्रोन्नति और वेतन विसंगतियों को दूर करना।
- ई-गवर्नेंस में तकनीकी सहयोग की कमी को पूरा करना।
- और सबसे अहम – काम का सम्मान और प्रशासनिक सहयोग।
जनता पर असर: पटवारी से लेकर नामांतरण तक सब अटका
इस आंदोलन का सीधा असर उन आम लोगों पर पड़ने वाला है, जो रोज़ाना तहसील ऑफिस में ज़मीन से जुड़े मामलों को लेकर जाते हैं।
नामांतरण, ऋण पुस्तिका, सीमांकन, और जाति-निवासी जैसे प्रमाणपत्रों के लिए फाइलें कई जगह अटक सकती हैं।
अब देखना ये है कि सरकार इस आंदोलन पर कितना ध्यान देती है और क्या कोई ठोस हल निकलता है या नहीं।
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