
छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलवाद के खात्मे के लिए तय की गई समयसीमा (डेडलाइन) अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। केवल 7 दिन का समय शेष बचा है और इसी बीच जंगलों में सक्रिय नक्सली कमांडरों के परिवार खुलकर सामने आने लगे हैं। सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और लगातार हो रही मुठभेड़ों के डर ने परिजनों को विचलित कर दिया है। अब वे मीडिया और सामाजिक माध्यमों के जरिए अपने अपनों से हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की मिन्नतें कर रहे हैं। परिजनों का मानना है कि अब हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन जीना ही एकमात्र सुरक्षित विकल्प बचा है।
सूर्यपाल बोड्डू के परिवार की गुहार: ‘अब घर लौट आओ, सब बदल गया है’
बीजापुर के कमकानार गांव के रहने वाले कुख्यात नक्सली कमांडर सूर्यपाल बोड्डू के घरवाले इस समय बेहद चिंतित हैं। परिवार ने सूर्यपाल के लिए एक भावुक संदेश जारी किया है जिसमें उन्होंने कहा है कि जंगल में अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। परिजनों के मुताबिक सूर्यपाल साल 2008 में संगठन से जुड़ा था और तब से वह गरियाबंद से लेकर झारखंड तक के इलाकों में सक्रिय रहा है। परिवार का कहना है कि जब बड़े-बड़े पद वाले कमांडर आत्मसमर्पण कर चुके हैं, तो सूर्यपाल को भी अपनी सुरक्षा और बच्चों के भविष्य के लिए वापस आ जाना चाहिए।
सुरक्षा बलों का बढ़ता शिकंजा: मुठभेड़ों के खतरे से सहमे परिजन
बस्तर संभाग में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के खिलाफ घेराबंदी काफी सख्त कर दी है। आए दिन होने वाली मुठभेड़ों और नए कैंपों की स्थापना ने नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म कर दिया है। परिजनों को डर है कि अगर उनके सदस्य जल्द ही सरेंडर नहीं करते हैं, तो वे किसी बड़ी कार्रवाई की चपेट में आ सकते हैं। यही वजह है कि अब घरवाले छिपकर नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से अपने सदस्यों को शांति की राह पर चलने की सलाह दे रहे हैं।
50 सक्रिय लड़ाके अब भी निशाने पर: पापा राव और सोढ़ी केशा की तलाश
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार बीजापुर के अंदरूनी इलाकों में अभी भी लगभग 50 सक्रिय नक्सली मौजूद हैं। इनमें पापा राव और सोढ़ी केशा जैसे इनामी और वांटेड कमांडर शामिल हैं। इन कमांडरों के पीछे सुरक्षा बल लगातार सर्च ऑपरेशन चला रहे हैं। पुलिस का मानना है कि अगर इन बड़े चेहरों के परिवार इसी तरह दबाव बनाएंगे, तो संगठन के निचले कैडर के लड़ाकों में भी घर वापसी का उत्साह जागेगा। प्रशासन ने भी स्पष्ट कर दिया है कि आत्मसमर्पण करने वालों को सरकार की पुनर्वास नीति का पूरा लाभ दिया जाएगा।
हिंसा की राह में कुछ नहीं रखा: बदलती सोच और टूटता संगठन
नक्सली परिवारों का कहना है कि दशकों पुराने इस सशस्त्र संघर्ष का अब कोई ठोस आधार नहीं बचा है। शिक्षा और विकास के पहुंचने से गांवों की सोच बदल रही है। सूर्यपाल के परिवार ने जोर देकर कहा कि जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता सम्मानजनक भविष्य और परिवार का साथ होना चाहिए। जंगल की मुश्किलों और अनिश्चितता भरे जीवन से बेहतर है कि सरकार की योजनाओं का लाभ उठाकर समाज की मुख्यधारा में शामिल हुआ जाए।
आत्मसमर्पण की उम्मीद: शांति बहाली की दिशा में बड़ा कदम
परिजनों की इन अपीलों के बाद बीजापुर पुलिस और प्रशासन को उम्मीद है कि आने वाले 7 दिनों में कुछ बड़े सरेंडर देखने को मिल सकते हैं। यह प्रक्रिया न केवल उन परिवारों के लिए राहत भरी होगी, बल्कि बस्तर में लंबे समय से चल रहे संघर्ष को समाप्त करने में भी मील का पत्थर साबित होगी। जिला प्रशासन ने आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए रहने, खाने और रोजगार की विशेष व्यवस्था करने का भरोसा दिलाया है ताकि वे बिना किसी डर के नई शुरुआत कर सकें।
आखिरी मौका: सुरक्षित भविष्य चुनने का समय
7 दिनों की यह डेडलाइन उन नक्सलियों के लिए आखिरी मौके की तरह देखी जा रही है जो अभी भी दोराहे पर खड़े हैं। परिजनों का साफ कहना है कि हथियार उठाने से केवल विनाश हुआ है, विकास नहीं। अब समय आ गया है कि बंदूक छोड़कर हल और तरक्की का रास्ता अपनाया जाए। अगर ये कमांडर अपने परिवार की बात मानकर लौटते हैं, तो बीजापुर में शांति और विकास का एक नया अध्याय शुरू होगा जिससे आने वाली पीढ़ियां खुशहाल हो सकेंगी।



