
CG Jail Death Report: छत्तीसगढ़ की जेलों के भीतर कैदियों की सुरक्षा और उनके स्वास्थ्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पिछले एक साल के भीतर राज्य की विभिन्न जेलों में 33 कैदियों की जान जा चुकी है। इस डराने वाले आंकड़े पर बिलासपुर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने जेल महानिदेशक को व्यक्तिगत शपथ पत्र दाखिल करने का आदेश दिया है, जिसमें हर एक मौत का विस्तृत विवरण और इलाज से जुड़ी पूरी जानकारी मांगी गई है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में देरी पर अदालत की कड़ी नाराजगी
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सिस्टम की सुस्ती पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। हैरानी की बात यह है कि कुल 33 मौतों में से 22 मामलों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अब तक जेल विभाग को नहीं मिल पाई है। अदालत ने इसे एक बड़ी लापरवाही करार दिया है। उदाहरण के तौर पर दुर्ग जेल में फरवरी 2025 में एक कैदी की मौत हुई थी, जिसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी लंबित है। कोर्ट ने सवाल किया है कि आखिर इतनी महत्वपूर्ण रिपोर्ट मिलने में इतनी देरी क्यों हो रही है?
जेलों की चिकित्सा व्यवस्था पर खड़े हुए गंभीर सवाल
जेल विभाग की ओर से दलील दी गई है कि ज्यादातर कैदियों की मौत किडनी फेल होने, दिल का दौरा पड़ने या शरीर के अंगों के काम न करने की वजह से हुई है। हालांकि, इन दावों ने जेलों के भीतर मौजूद अस्पतालों और डॉक्टरों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। कोर्ट ने पूछा कि अगर जेलों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं हैं, तो कैदियों की स्थिति इतनी गंभीर क्यों हो जाती है कि उन्हें रायपुर के मेकाहारा (अंबेडकर अस्पताल) रेफर करना पड़ता है? रिकॉर्ड बताते हैं कि अधिकतर कैदियों ने रायपुर में इलाज के दौरान दम तोड़ा है।
बिलासपुर केंद्रीय जेल में सबसे ज्यादा मौतें दर्ज
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि मौतों का यह सिलसिला किसी एक जेल तक सीमित नहीं है। बिलासपुर केंद्रीय जेल में सबसे अधिक 10 कैदियों की मौत हुई है। इसके बाद दुर्ग में 8 और अंबिकापुर जेल में 5 कैदियों की जान गई है। इसके अलावा जगदलपुर, गरियाबंद, धमतरी और रायगढ़ की जेलों में भी कैदियों की मौत के मामले सामने आए हैं। जेलों के भीतर बढ़ते मौत के ग्राफ ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की भी चिंता बढ़ा दी है।
मानवाधिकार आयोग ने तलब किया दो साल का रिकॉर्ड
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) भी सख्त हो गया है। आयोग ने जेल विभाग से पिछले दो सालों का पूरा रिकॉर्ड मांगा है। आयोग ने विशेष रूप से जेलों में डॉक्टरों की तैनाती, दवाइयों की उपलब्धता और कैदियों को दी जाने वाली मेडिकल केयर की जांच शुरू कर दी है। मानवाधिकार आयोग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि क्या कैदियों को समय पर उचित इलाज मिल रहा था या प्रशासनिक अनदेखी उनकी मौत की वजह बनी।
मजिस्ट्रियल जांच की रिपोर्ट भी अब तक लापता
जेल के भीतर किसी भी कैदी की मौत होने पर मजिस्ट्रियल जांच कराना अनिवार्य होता है। कोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया कि न केवल पोस्टमार्टम, बल्कि कई मामलों में मजिस्ट्रियल जांच की रिपोर्ट भी जेल विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। बिना इन रिपोर्टों के यह तय करना नामुमकिन है कि मौत प्राकृतिक थी या किसी अन्य कारण से हुई। हाईकोर्ट ने अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 अप्रैल की तारीख तय की है, जिसमें जेल प्रशासन को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
जेल सुधारों की बढ़ती जरूरत और भविष्य की रणनीति
कैदियों की मौत के बढ़ते मामलों ने छत्तीसगढ़ के जेल प्रशासन को सुधारों के लिए मजबूर कर दिया है। जानकारों का मानना है कि जेलों में कैदियों की क्षमता से अधिक संख्या और चिकित्सा संसाधनों की कमी इस संकट की मुख्य वजह है। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि जेलों के भीतर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल, सबकी नजरें 15 अप्रैल को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां जेल विभाग को कोर्ट के कड़े सवालों के जवाब देने होंगे।
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