
रायपुर: छत्तीसगढ़ में सरकारी सेवाओं को हाईटेक बनाने की कोशिशें मोबाइल नेटवर्क की सुस्त रफ़्तार के आगे दम तोड़ रही हैं। राज्य सरकार ने पारदर्शिता के नाम पर 19 विभागों की लगभग 100 योजनाओं को ऑनलाइन तो कर दिया, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा आज भी ‘नो सिग्नल ज़ोन’ में है। बस्तर और सरगुजा संभाग के सुदूर इलाकों में मोबाइल केवल एक डिब्बा बनकर रह गया है। आलम यह है कि कॉल करने या डेटा भेजने के लिए लोगों को पहाड़ियों और पेड़ों का सहारा लेना पड़ रहा है। डिजिटल कनेक्टिविटी के अभाव में सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं फाइलों और पोर्टल के बीच ही उलझकर रह गई हैं।
अटल मॉनिटरिंग पोर्टल का डैशबोर्ड पड़ा खाली
शासन ने योजनाओं की निगरानी के लिए ‘अटल मॉनिटरिंग पोर्टल’ बनाया है, जिसका मकसद हर काम की लाइव रिपोर्टिंग करना था। लेकिन बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और जशपुर जैसे जिलों के सैकड़ों गांवों में नेटवर्क नदारद होने के कारण डेटा अपलोड ही नहीं हो पा रहा है। स्थिति यह है कि जब तक कर्मचारी नेटवर्क वाले क्षेत्र में नहीं पहुंचता, तब तक पोर्टल पर जानकारी शून्य ही रहती है। इस तकनीकी गैप का फायदा उठाकर कुछ लोग भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा दे रहे हैं, जिसका नतीजा कवर्धा और बस्तर जैसे इलाकों में गायब हुए सरकारी धान के रूप में सामने आ चुका है।
धान बेचने के लिए नेटवर्क का इंतज़ार कर रहे किसान
राज्य की धान खरीदी व्यवस्था पूरी तरह डिजिटल टोकन पर टिकी है। किसानों को समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेचने के लिए ऑनलाइन स्लॉट बुक करना पड़ता है। नेटवर्क कमजोर होने के कारण ग्रामीण इलाकों के किसान समय पर टोकन डाउनलोड नहीं कर पा रहे हैं। कई बार सर्वर डाउन होने या सिग्नल गायब होने की वजह से उनकी बारी निकल जाती है और उन्हें फिर से लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता है। समितियों के चक्कर काट रहे किसानों का कहना है कि सरकार ने नियम तो ऑनलाइन बना दिए, लेकिन गांव की कनेक्टिविटी सुधारना भूल गई।
पेड़ पर चढ़कर हाजिरी लगाने को मजबूर शिक्षक
सरकारी कर्मचारियों के लिए ऑनलाइन अटेंडेंस अब जी का जंजाल बन गई है। स्कूलों और पंचायतों में मोबाइल ऐप के जरिए उपस्थिति दर्ज करना अनिवार्य है, लेकिन नेटवर्क न होने पर यह संभव नहीं हो पाता। कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन का कहना है कि कई बार शिक्षकों को हाजिरी लगाने के लिए स्कूल की छत या ऊंचे पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है। यह स्थिति न केवल अमानवीय है बल्कि इससे कर्मचारियों और सरकार के बीच विवाद भी बढ़ रहा है। नेटवर्क न होने की स्थिति में प्रशासन कर्मचारियों पर लापरवाही का आरोप मढ़ देता है, जबकि असल समस्या तकनीकी बुनियादी ढांचे की है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर बढ़ा मानसिक दबाव
नेटवर्क संकट की सबसे बड़ी गाज आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर गिरी है। पोषण ट्रैकर ऐप में बच्चों और गर्भवती महिलाओं का डेटा रोज़ाना फीड करना होता है। नेटवर्क फेल होने पर समय पर एंट्री नहीं हो पाती, जिसके बदले उन्हें नोटिस और वेतन कटौती जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। आंगनबाड़ी संघ की मानें तो इस तकनीकी समस्या ने उनकी मानसिक परेशानी बढ़ा दी है। फील्ड में काम करने के बावजूद डेटा सिंक न होने की वजह से उनकी मेहनत कागजों पर दिखाई नहीं देती, जो सीधे तौर पर उनके मूल्यांकन को प्रभावित कर रही है।
इलाज और एंबुलेंस के लिए भटक रही जनता
आम जनता के लिए नेटवर्क का गायब होना जानलेवा भी साबित हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में मोबाइल सिग्नल न मिलने के कारण समय पर 108 एंबुलेंस को कॉल नहीं लग पाता। मजबूरी में परिजनों को मरीज़ को खाट या मोटरसाइकिल पर लादकर मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है। इसके अलावा राशन कार्ड अपडेट, आधार सीडिंग और बैंकिंग सेवाओं के लिए भी ग्रामीणों को कई किलोमीटर का सफर तय करना पड़ रहा है। कनेक्टिविटी की इस कमी ने दूरस्थ अंचल के लोगों को मुख्यधारा की सुविधाओं से काट कर रख दिया है।
5000 टावर की दरकार पर मिले केवल 513
प्रदेश में कनेक्टिविटी की गंभीर समस्या को देखते हुए राज्य सरकार ने केंद्र से 5,000 नए मोबाइल टावरों की मांग की थी। हालांकि, अब तक केवल 513 टावरों को ही मंजूरी मिली है। भरतपुर-सोनहत जैसे विधानसभा क्षेत्रों के 47 गांवों में आज भी सन्नाटा पसरा है। विधायक रेणुका सिंह का कहना है कि गांवों में जाने पर पता चलता है कि लोग कितनी मुश्किल में हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का दावा है कि चरणबद्ध तरीके से टॉवरों की संख्या बढ़ाई जाएगी, लेकिन तब तक 100 से अधिक योजनाओं की मॉनिटरिंग भगवान भरोसे ही चलती रहेगी।



