
Rajiv Lochan Mandir Rajim: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 47 किलोमीटर की दूरी पर स्थित राजिम एक ऐसा पावन स्थल है, जिसे ‘छत्तीसगढ़ का प्रयाग’ कहा जाता है। यहाँ महानदी के साथ पैरी और सोंढुर नदियों का मिलन होता है, जिसे त्रिवेणी संगम के नाम से जाना जाता है। इसी संगम के किनारे भगवान विष्णु को समर्पित अति प्राचीन राजीव लोचन मंदिर स्थित है। सड़क मार्ग से यहाँ पहुँचना बेहद सुगम है और नियमित बसें व अन्य साधन यात्रियों के लिए हर समय उपलब्ध रहते हैं।
कमल क्षेत्र और सृष्टि की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजिम का प्राचीन नाम ‘कमल क्षेत्र’ या ‘पद्मावती पुरी’ था। कहा जाता है कि सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु की नाभि से निकला कमल इसी स्थान पर स्थित था, जहाँ बैठकर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। मंदिर की बनावट को लेकर यह भी चर्चा रहती है कि यह पांच कोस के वर्गाकार सरोवर के बीच कमल के फूल के समान है, जिसकी पंखुड़ियों पर पांच स्वयंभू महादेव विराजमान हैं। इसी विशेषता के कारण इसे ‘पंचकोसी धाम’ भी पुकारा जाता है।

पुरातात्विक धरोहर और शिलालेखों का प्रमाण
राजिम न केवल भक्तों के लिए बल्कि इतिहास प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। यहाँ से प्राप्त शिलालेखों और सिक्कों से पता चलता है कि यह स्थान सदियों से वैभवशाली रहा है। राजीव लोचन मंदिर में कल्चुरी संवत् के शिलालेख मिलते हैं, जिनमें राजा जगतपाल और अन्य शासकों का वर्णन है। इतिहासकारों का मानना है कि यहाँ की सभ्यता पाषाण काल से लेकर मौर्य और कल्चुरी काल तक फैली हुई है। खुदाई में मिलने वाले अवशेष यहाँ दबे प्राचीन राज और गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं।
भगवान विष्णु की चतुर्भुज मनमोहक प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की काले पत्थर से निर्मित भव्य चतुर्भुज मूर्ति स्थापित है। भगवान अपने चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए हैं। मूर्ति की चमक और बनावट इतनी प्रभावशाली है कि दर्शनार्थी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। मंदिर परिसर के भीतर ही भगवान के दशावतार और बाल मुकुंद जी के छोटे मंदिर भी बने हुए हैं, जो इसकी धार्मिक महत्ता को और बढ़ाते हैं।

वास्तुकला और जीर्णोद्धार का इतिहास
राजिम के मंदिरों का निर्माण लगभग 5वीं से 7वीं सदी के बीच माना जाता है। इतिहास कहता है कि नलवंशीय शासक विलासतुंग ने इस मंदिर को बनवाया था, जबकि बाद में कल्चुरी शासकों ने इसका जीर्णोद्धार कराया। मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी और स्तंभों की शिल्पकारी उस दौर के देव-शिल्पियों की कुशलता को दर्शाती है। माना जाता है कि इन मंदिरों की रचना स्वयं विश्वकर्मा जी ने की थी।

त्रिवेणी के बीच विराजित कुलेश्वर महादेव
संगम के ठीक बीचों-बीच कुलेश्वर महादेव का विशाल मंदिर बना हुआ है। मानसून के समय जब नदियां उफान पर होती हैं, तब इस मंदिर का दृश्य बेहद विहंगम हो जाता है। जनश्रुति है कि वनवास काल के दौरान माता सीता ने यहाँ अपने कुलदेवता महादेव की पूजा की थी और रेत से शिवलिंग बनाया था। मंदिर के समीप ही धौम्य ऋषि का आश्रम भी स्थित है, जो इस स्थान को और भी शांत और आध्यात्मिक बनाता है।
माघ पूर्णिमा का भव्य राजिम कुंभ
राजिम में हर साल माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसे अब ‘राजिम कुंभ’ के नाम से जाना जाता है। इस दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु और देश-भर से साधु-संत यहाँ जुटते हैं। संगम में पवित्र स्नान करने के बाद भगवान राजीव लोचन के दर्शन की परंपरा है। सावन के महीने में यहाँ ‘बोल बम’ के नारों की गूँज रहती है और भक्त दूर-दूर से कांवड़ लेकर जल चढ़ाने पहुँचते हैं।

पीढ़िया प्रसाद की अनूठी परंपरा
राजीव लोचन मंदिर का सबसे खास आकर्षण यहाँ का ‘पीढ़िया प्रसाद’ है। चावल के आटे और शक्कर से बना यह प्रसाद राजिम की पहचान बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में इस प्रसाद को लेकर गहरी आस्था है। लोग इसे बड़े आदर के साथ अपने घरों में सहेज कर रखते हैं। दिवाली के समय गोवर्धन पूजा की खिचड़ी में इस महाप्रसाद को मिलाने का रिवाज है, जो यहाँ की लोक संस्कृति के अटूट हिस्से को दर्शाता है।

सर्वधर्म समभाव का जीता-जागता उदाहरण
राजिम केवल वैष्णव या शैव संप्रदाय तक सीमित नहीं है। यहाँ जैन धर्म के प्रति भी गहरी आस्था देखी जाती है। राजिम में स्थित जैन मंदिर समुदाय के त्याग और तपस्या की प्रेरणा देते हैं। इसके अलावा, जगन्नाथ पुरी की यात्रा से लौटने वाले श्रद्धालु अपनी यात्रा को तभी पूर्ण मानते हैं जब वे राजिम लोचन के दर्शन कर लेते हैं। यहाँ के राम मंदिर की आधुनिक शिल्प कला भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
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