
छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्म मानने वाले आदिवासियों के शवों को कब्र से बाहर निकालकर गांव की सीमा से बाहर दफनाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की तीन जजों वाली बेंच ने इस मामले में दखल देते हुए अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि फिलहाल दफनाए जा चुके किसी भी शव को कब्र से बाहर नहीं निकाला जाएगा और न ही उन्हें कहीं और शिफ्ट किया जाएगा।
प्रशासन की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
अदालत में याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्विस ने दलील दी कि राज्य प्रशासन कथित तौर पर शवों को हटाने की इस कार्रवाई का साथ दे रहा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि आदिवासी ईसाई परिवारों को उनके अपने ही गांव में अंतिम संस्कार करने से रोका जा रहा है, जबकि बाकी समुदायों को यह अधिकार मिल रहा है। कुछ मामलों में तो परिजनों को बिना बताए ही शवों को कब्र से निकालने की कोशिशें की गई हैं जिससे पूरे इलाके में डर और तनाव का माहौल बन गया है।
अनुच्छेद 32 के तहत बुनियादी अधिकारों की रक्षा
यह मामला संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में लाया गया है जो मौलिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा है। याचिका के जरिए मांग की गई है कि हर नागरिक को उसके निवास वाले गांव में गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार का हक मिलना चाहिए, चाहे उसका धर्म या जाति कुछ भी हो। इसके साथ ही अदालत से अपील की गई है कि वह राज्य सरकार को हर गांव में सभी समुदायों के लिए कब्रिस्तान की जमीन तय करने का निर्देश दे ताकि पारंपरिक प्रथाओं में कोई हस्तक्षेप न हो।
पुराने फैसलों की व्याख्या को लेकर बढ़ा कानूनी विवाद
इस विवाद के पीछे एक पुराने कानूनी फैसले की अलग-अलग व्याख्याओं को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। याचिका में कहा गया है कि पुलिस रमेश बघेल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले के एक फैसले का हवाला देकर ईसाइयों को गांव में दफनाने से रोक रही है। दरअसल उस पुराने मामले में एक जज ने निजी जमीन पर दफनाने की बात कही थी, जबकि दूसरे जज का कहना था कि दफन केवल तय किए गए कब्रिस्तान में ही होना चाहिए। इसी कानूनी उलझन का फायदा उठाकर शवों को हटाने का दबाव बनाया जा रहा है।
ग्राम सभा के बोर्ड और बढ़ता सामाजिक तनाव
छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में यह विवाद तब और गहरा गया जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। उस फैसले में ग्राम सभा द्वारा गांव के प्रवेश द्वार पर खास समुदायों के प्रवेश पर रोक लगाने वाले बोर्ड को सही माना गया था। इसी पृष्ठभूमि में अब शवों को दफनाने और उन्हें हटाने का मुद्दा और भी ज्यादा संवेदनशील हो गया है जिससे स्थानीय स्तर पर विवाद बढ़ रहा है।
सरकार को नोटिस और यथास्थिति बनाए रखने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले पर छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने साफ कर दिया है कि जब तक अगली सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक मौके पर यथास्थिति बनी रहेगी। इसका मतलब है कि प्रशासन न तो कोई नया शव निकलवा पाएगा और न ही पुराने दफन किए गए शवों को वहां से हटा सकेगा। अब सबकी नजरें राज्य सरकार के जवाब और कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
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