
Deepasha Buffalo Cloning Controversy: छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वन भैंसा के संरक्षण के नाम पर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। क्लोनिंग तकनीक से जन्मी ‘दीपआशा’ को लेकर अब यह सवाल उठ रहे हैं कि वह वास्तव में वन भैंसा है या साधारण मुर्रा भैंस। राज्य सरकार ने इस परियोजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए थे, लेकिन अब जब दीपआशा की पहचान पर सवाल उठे हैं, तो इसे तैयार करने वाली संस्था एनडीआरआई (NDRI) करनाल गोलमोल जवाब दे रही है। इस मामले ने न केवल वैज्ञानिकों की कार्यप्रणाली बल्कि वन विभाग के दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
डीएनए टेस्ट और पहचान पर संस्थान की चुप्पी
छत्तीसगढ़ वन विभाग ने इसी साल जनवरी में एनडीआरआई करनाल को पत्र लिखकर दीपआशा की असलियत जाननी चाही थी। सरकार ने स्पष्ट रूप से पूछा था कि क्या दीपआशा वास्तव में वन भैंसा है और क्या जन्म के समय उसका कोई डीएनए टेस्ट किया गया था। हैरानी की बात यह है कि संस्थान ने इन सीधे सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं दिया। जवाब के बदले संस्थान ने केवल 2016 की एक पुरानी रिपोर्ट भेज दी, जिसमें क्लोनिंग की तकनीक और प्रक्रिया का जिक्र है। संस्थान की इस चुप्पी ने दीपआशा के शुद्ध वन भैंसा होने के संदेह को और गहरा कर दिया है।
दिखने में वन भैंसा नहीं, मुर्रा भैंस जैसी है दीपआशा
दीपआशा को साल 2018 से ही आम जनता की नजरों से दूर रखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि उसे छिपाने की मुख्य वजह उसकी शारीरिक बनावट है। एक शुद्ध वन भैंसा की सबसे बड़ी पहचान उसके चौड़े और लंबे सींग होते हैं, लेकिन दीपआशा के सींग काफी छोटे हैं और वह देखने में बिल्कुल मुर्रा भैंस जैसी लगती है। 11 साल पहले जब दुनिया की पहली वन भैंस का क्लोन बनाने का दावा किया गया था, तब इसे बड़ी उपलब्धि बताया गया था, लेकिन अब वही उपलब्धि विवादों के घेरे में है।
क्लोनिंग की प्रक्रिया और तकनीक पर उठे सवाल
दीपआशा का जन्म दिसंबर 2014 में करनाल के नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिट्यूट में हुआ था। इसके लिए उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व की मादा वन भैंस ‘आशा’ के सेल्स का इस्तेमाल किया गया था, जबकि अंडाशय दिल्ली के एक बूचड़खाने की देसी भैंस से लिया गया था। वैज्ञानिकों का दावा था कि इस तकनीक से पैदा हुआ बच्चा शत-प्रतिशत वन भैंसा होगा। अगस्त 2018 में इसे रायपुर के जंगल सफारी लाया गया, लेकिन विशेषज्ञों ने तभी से इसके असली होने पर आपत्ति जताना शुरू कर दिया था।
राजकीय पशु के संरक्षण के नाम पर करोड़ों का खेल
छत्तीसगढ़ सरकार ने साल 2001 में वन भैंसा को राजकीय पशु घोषित किया था। उस समय प्रदेश में इनकी संख्या करीब 80 थी, जो अब घटकर बहुत कम रह गई है। इनकी प्रजाति को बचाने के लिए करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत किया गया और क्लोनिंग जैसी महंगी तकनीक का सहारा लिया गया। आरोप है कि भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी विभाग वन भैंसों का कुनबा बढ़ाने में विफल रहा और अब क्लोन के नाम पर भी धोखाधड़ी की आशंका जताई जा रही है।
इंद्रावती और उदंती तक सिमट गया वन भैंसों का संसार
20वीं सदी की शुरुआत में वन भैंसा अमरकंटक से लेकर बस्तर तक के जंगलों में भारी संख्या में पाया जाता था। शिकार और प्राकृतिक आवास के विनाश के कारण अब ये केवल दंतेवाड़ा के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान और उदंती अभयारण्य तक ही सीमित रह गए हैं। राजकीय पशु के अस्तित्व पर आए इस संकट के बीच दीपआशा विवाद ने संरक्षण के प्रयासों को बड़ा झटका दिया है। यदि दीपआशा वन भैंसा नहीं निकलती है, तो यह प्रदेश की वन्यजीव संरक्षण योजनाओं के लिए एक बड़ा शर्मनाक वाकया होगा।
विशेषज्ञों की मौजूदगी में हुआ था हस्तांतरण
जब दीपआशा को करनाल से रायपुर लाया गया था, तब वन विभाग ने दो विशेषज्ञों, डॉ. जयकिशोर जडिया और वीके चंदन को करनाल भेजा था। इन विशेषज्ञों की मौजूदगी में ही दीपआशा को जंगल सफारी लाया गया था। सवाल यह उठ रहा है कि क्या उस समय इन विशेषज्ञों ने उसकी शारीरिक बनावट और प्रजाति के लक्षणों की जांच नहीं की थी। फिलहाल, सरकार अब इस पूरे मामले की जांच को आगे बढ़ाने और दीपआशा के डीएनए की दोबारा जांच कराने पर विचार कर रही है ताकि सच्चाई सामने आ सके।



