
छत्तीसगढ़ में सरकारी दफ्तरों की कार्यप्रणाली सुधारने के लिए लागू की गई आधार आधारित बायोमेट्रिक अटेंडेंस प्रणाली (AEBAS) अब एक बड़े विवाद का रूप ले चुकी है। सरकार ने इसे लेटलतीफी रोकने का अचूक नुस्खा बताया था, लेकिन कर्मचारी इसे अपनी निजता और सुरक्षा के लिए खतरा मान रहे हैं। कर्मचारियों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आधार डेटा लीक होने से उनका बैंक खाता खाली हो गया, तो क्या सरकार इसकी जिम्मेदारी लेगी? इस डर और तकनीकी दिक्कतों ने कर्मचारियों को लामबंद कर दिया है, जिससे दफ्तरों में कामकाज के साथ-साथ तनाव भी बढ़ रहा है।
2024 की शुरुआत से लागू हुई नई व्यवस्था
छत्तीसगढ़ सरकार ने सामान्य प्रशासन विभाग के जरिए चरणबद्ध तरीके से इस प्रणाली को लागू करने के निर्देश दिए थे। शुरुआत में इसे राजधानी के मंत्रालय और विभागाध्यक्ष कार्यालयों में शुरू किया गया, लेकिन जल्द ही इसका विस्तार स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बड़े महकमों तक कर दिया गया। नई व्यवस्था के तहत हर कर्मचारी को फिंगरप्रिंट या फेस स्कैन के जरिए उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य है। सरकार का तर्क है कि इससे कर्मचारियों की जवाबदेही बढ़ेगी, लेकिन पुलिस विभाग को इस दायरे से बाहर रखने पर अन्य विभागों के कर्मचारियों ने भेदभाव का आरोप लगाना शुरू कर दिया है।
स्वास्थ्य कर्मचारियों ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा
इस प्रणाली का सबसे मुखर विरोध स्वास्थ्य विभाग की ओर से हो रहा है। डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ का कहना है कि उनकी ड्यूटी 24 घंटे की आपातकालीन सेवाओं से जुड़ी होती है। अस्पतालों में शिफ्ट बदलना, अचानक किसी मरीज के लिए ऑपरेशन थिएटर जाना या फील्ड विजिट पर निकलना आम बात है। ऐसी स्थिति में एक तय मशीन पर जाकर अंगूठा लगाना व्यवहारिक नहीं है। इसी विरोध के चलते कर्मचारी संगठनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी है। याचिका में तर्क दिया गया है कि आधार को हाजिरी के लिए अनिवार्य करना सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय निजता के अधिकार का उल्लंघन है।
क्या कहती है आधार पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन?
Supreme Court. कर्मचारी संगठनों ने अपनी दलीलों में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि आधार का उपयोग केवल उन्हीं सेवाओं के लिए अनिवार्य किया जा सकता है जो कानून द्वारा समर्थित हों। किसी भी व्यक्ति को उसकी नौकरी, वेतन या सेवा शर्तों से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके पास आधार नहीं है या वह उसका उपयोग नहीं करना चाहता। कर्मचारियों का कहना है कि बिना किसी विधायी कानून के, सेवा शर्तों में इस तरह का एकतरफा बदलाव करना पूरी तरह गैर-कानूनी है।
नेटवर्क और बिजली की समस्या ने बढ़ाई मुश्किल
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में इस व्यवस्था का हाल और भी बुरा है। कर्मचारियों का कहना है कि बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क और बिजली कटौती आम बात है। कई बार सर्वर डाउन होने या फिंगरप्रिंट मैच न होने की वजह से कर्मचारी समय पर दफ्तर पहुंचने के बाद भी ‘अनुपस्थित’ दर्ज हो जाते हैं। इसका सीधा असर उनके वेतन और सर्विस रिकॉर्ड पर पड़ता है। मैदानी अमले का कहना है कि मशीनों की तकनीकी खराबी की सजा उन्हें आर्थिक नुकसान के रूप में मिल रही है।
पुलिस की तरह छूट देने की उठ रही मांग
कर्मचारी संगठनों ने सरकार की दोहरी नीति पर भी सवाल उठाए हैं। छत्तीसगढ़ राज्य अधिकारी कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष आलोक मिश्रा के मुताबिक, जिस तरह पुलिस विभाग को उनकी फील्ड ड्यूटी और व्यस्तता के कारण बायोमेट्रिक से छूट दी गई है, वही नियम स्वास्थ्य विभाग पर भी लागू होना चाहिए। डॉक्टरों का कहना है कि जब वे किसी गंभीर मरीज की जान बचा रहे होते हैं, तब उनके लिए बायोमेट्रिक मशीन तक जाकर हाजिरी लगाना संभव नहीं होता। यह व्यवस्था काम में बाधा डालने वाली साबित हो रही है।
सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक प्रदर्शन
कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। जिला स्तर पर ज्ञापन सौंपने के बाद अब सोशल मीडिया पर ‘डिजिटल स्ट्राइक’ शुरू कर दी गई है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि इस आदेश को वापस नहीं लिया गया या इसमें जरूरी बदलाव नहीं किए गए, तो जल्द ही पूरे प्रदेश में काम बंद कर राज्यव्यापी आंदोलन किया जाएगा। शिक्षा और महिला बाल विकास विभाग के कर्मचारियों ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया है, जिससे सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
डिजिटल सुरक्षा पर गहराते गंभीर सवाल
सबसे बड़ा मुद्दा डेटा सुरक्षा का है। कर्मचारियों के मन में यह घर कर गया है कि बायोमेट्रिक मशीनों पर बार-बार फिंगरप्रिंट देने से उनकी बैंकिंग जानकारी खतरे में पड़ सकती है। हाल के दिनों में आधार इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम (AePS) के जरिए हुई धोखाधड़ी की खबरों ने इस डर को और बढ़ा दिया है। कर्मचारियों का कहना है कि सरकार को पहले डेटा सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए। फिलहाल, यह मामला अनुशासन बनाम निजता के बीच फंसा हुआ है और अब सबकी नजरें कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।



