
CG School Management Committee: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों की प्रशासनिक और व्यावहारिक व्यवस्था में राज्य सरकार ने एक बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव करने का निर्णय लिया है. अब तक सरकारी स्कूलों में राजनीतिक रसूख और बाहरी हस्तक्षेप का केंद्र बनी रहने वाली शाला विकास समितियों (एसएमडीसी) को पूरी तरह से भंग कर दिया गया है. सरकार इनके स्थान पर अब नए सिरे से स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (एसएमसी) का गठन करने जा रही है. इस नई व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों पर किसी नेता या बाहरी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं होगी, बल्कि स्कूल में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं के माता-पिता ही इस पद को संभालेंगे. इस कदम से स्कूलों के रोजमर्रा के कामकाज में अभिभावकों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित होगी.
केंद्र की एसएमसी गाइडलाइन के तहत राज्य सरकार का आदेश, सभी जिला कलेक्टरों को जारी हुए निर्देश
स्कूल शिक्षा विभाग ने इस बड़े नीतिगत बदलाव को धरातल पर उतारने के लिए प्रदेश के सभी जिला कलेक्टरों और जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) को कड़े दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं. केंद्र सरकार की नई एसएमसी गाइडलाइन के अनुरूप ही राज्य में इस व्यवस्था को लागू किया जा रहा है. विभागीय आदेश के अनुसार, प्राथमिक स्तर से लेकर कक्षा 12वीं तक के सभी शासकीय विद्यालयों में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के ठीक एक महीने के भीतर इन नई स्कूल मैनेजमेंट कमेटियों का गठन करना अनिवार्य कर दिया गया है ताकि सत्र की शुरुआत से ही काम सुचारू रूप से चल सके.
छात्र संख्या के आधार पर तय होगा समिति का आकार, 75 फीसदी जगह सिर्फ माता-पिता के लिए सुरक्षित
नई गाइडलाइन के मुताबिक, स्कूल मैनेजमेंट कमेटी में कुल कितने सदस्य होंगे, इसका निर्धारण स्कूल में दर्ज छात्र संख्या के आधार पर किया जाएगा. जिन स्कूलों में 100 तक विद्यार्थी हैं वहां 12 से 15 सदस्य होंगे. वहीं 100 से 500 की छात्र संख्या वाले स्कूलों में 15 से 20 सदस्य और 500 से अधिक बच्चों वाले बड़े स्कूलों में 20 से 25 सदस्यों की कमेटी बनेगी. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी कमेटी में 75 प्रतिशत हिस्सेदारी अनिवार्य रूप से सिर्फ और सिर्फ बच्चों के माता-पिता या उनके कानूनी अभिभावकों की ही होगी, जिससे उनके फैसलों का वजन बढ़ेगा.
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठेंगे अभिभावक, स्कूल के प्राचार्य निभाएंगे सचिव की जिम्मेदारी
नई प्रशासनिक संरचना में समिति के शीर्ष पदों यानी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कमान पूरी तरह से अभिभावकों के हाथों में सौंप दी गई है. इनके अलावा कमेटी में संतुलन बनाए रखने के लिए स्थानीय नगर निकाय या पंचायत के एक निर्वाचित प्रतिनिधि, स्कूल के एक शिक्षक, स्थानीय शिक्षाविद् या विषय विशेषज्ञ, विद्यालय के किसी पूर्व छात्र, स्थानीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता अथवा एएनएम को भी बतौर सदस्य शामिल किया जाएगा. स्कूल के प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य इस पूरी कमेटी के सदस्य सचिव होंगे जो प्रशासनिक तालमेल बैठाने का काम करेंगे.
एक लाख रुपये तक के कार्यों के लिए मिली वित्तीय छूट, बिना विभागीय मंजूरी के खुद ले सकेंगे फैसले
स्कूलों के छोटे-मोटे विकास कार्यों के लिए अब प्राचार्यों या समितियों को जिला मुख्यालय के चक्कर नहीं काटने होंगे. नई एसएमसी को सीमित वित्तीय अधिकार सौंपते हुए एक लाख रुपये तक के निर्माण और मरम्मत कार्यों को सीधे अपने स्तर पर कराने की मंजूरी दे दी गई है. इसके दायरे में स्कूल के शौचालयों का निर्माण व जीर्णोद्धार, शुद्ध पेयजल की व्यवस्था, बिजली की फिटिंग दुरुस्त कराना, दिव्यांग बच्चों के लिए रैंप का निर्माण और अन्य छोटी-मोटी टूट-फूट को ठीक कराना शामिल है. हालांकि एक लाख रुपये से अधिक लागत वाले बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए पुरानी विभागीय टेंडर व्यवस्था ही लागू रहेगी.
ड्राप आउट बच्चों को वापस लाने और पीएम पोषण योजना की निगरानी करने का भी मिला जिम्मा
इस नई समिति का काम केवल स्कूल भवन की मरम्मत या रखरखाव तक ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में भी इनकी बड़ी भूमिका होगी. कमेटी को हर महीने कम से कम एक अनिवार्य बैठक बुलानी होगी. समिति की जिम्मेदारी होगी कि वे स्कूल छोड़ चुके (ड्राप आउट) बच्चों की पहचान कर उन्हें दोबारा दाखिला दिलाएं, दाखिला अभियान चलाएं और बुनियादी साक्षरता लक्ष्यों को हासिल करने में शिक्षकों की मदद करें. इसके साथ ही दोपहर में मिलने वाले पीएम पोषण (मिड-डे मील) की गुणवत्ता और बच्चों के स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों की कड़ाई से निगरानी करने का जिम्मा भी अब इसी समिति के पास होगा.
स्कूल ग्रांट के पैसों और बच्चों की सुरक्षा पर रहेगी पैनी नजर, पारदर्शिता के लिए उठाए गए कदम
अक्सर सरकारी स्कूलों में मिलने वाले अनुदान या ग्रांट के पैसों के दुरुपयोग की शिकायतें आती रहती हैं. इस व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए नई स्कूल मैनेजमेंट कमेटी स्कूल विकास योजना (SDP) तैयार करेगी और सरकार से मिलने वाली सहायता राशि के पाई-पाई के खर्च का हिसाब रखेगी. इसके अलावा स्कूल परिसर में बच्चों की सुरक्षा, उनके कल्याण और खेलकूद की गतिविधियों पर भी समिति नजर रखेगी. इस नए नियम के आने से जहां एक तरफ स्कूलों में स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता आएगी, वहीं शिक्षकों और अभिभावकों के बीच की दूरी भी कम होगी.



