Teejan Bai biography in Hindi: तीजन बाई का सफर:सामाजिक बहिष्कार और तीन टूटी शादियों के दर्द से देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान तक की कहानी

Teejan Bai biography in Hindi: छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान देने वाली प्रख्यात पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का निधन हो गया है। उन्होंने 70 वर्ष की आयु में रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली। वह पिछले कई हफ्तों से उम्र से जुड़ी विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं और 27 मई से अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उनके जाने से देश के सांस्कृतिक जगत और विशेष रूप से लोक कला के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया है। तीजन बाई ने न केवल छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला को जीवित रखा बल्कि रूढ़िवादी सामाजिक बंधनों को तोड़कर महिलाओं के लिए नए रास्ते भी खोले।

छत्तीसगढ़ की माटी से वैश्विक मंच तक का सफर

Birth info about Teejan Bai: तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को भिलाई से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित गनियारी गांव में हुआ था। उनका जन्म छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोकपर्व तीज के दिन हुआ था जिसके कारण उनके माता-पिता चुनुक लाल पारधी और सुखवती पारधी ने उनका नाम तीजन रखा था। वह अनुसूचित जनजाति पारधी समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। बचपन से ही उनका जीवन काफी तंगी और अभावों में गुजरा था। पशु-पक्षियों की आवाजें, मां के गाए लोकगीत और पिता के जरिए बजाई जाने वाली बांसुरी ने बचपन में ही उनके भीतर संगीत के प्रति एक गहरा लगाव पैदा कर दिया था।

नाना की कहानियों से मिला जीवन का असली लक्ष्य

तीजन बाई के भीतर पंडवानी गायन का बीज उनके नाना बृजलाल पारधी ने बोया था। बचपन में वे अपने नाना को छत्तीसगढ़ी लेखक सबल सिंह चौहान द्वारा रचित महाभारत की कहानियों का पाठ करते हुए सुनती थीं। ये प्रसंग उनके मन में इस कदर बैठ गए कि उन्होंने छिपकर इसका अभ्यास करना शुरू कर दिया। हालांकि उस दौर में समाज के भीतर किसी लड़की का इस तरह लोकगायन करना अच्छा नहीं माना जाता था। सामाजिक पाबंदियों की वजह से वे कभी स्कूल नहीं जा सकीं लेकिन बाद में साक्षरता अभियान से जुड़कर उन्होंने पांचवीं तक की शिक्षा प्राप्त की।

पुरुषों के गढ़ में बनाई जगह, कापालिक शैली की पहली महिला

पंडवानी मूल रूप से महाभारत की कथाओं पर आधारित एक एकल नाट्य लोकगीत है जिसमें पांडवों की गाथा सुनाई जाती है। छत्तीसगढ़ में इसकी दो शैलियां प्रचलित हैं, पहली वेदमती शैली जिसमें कलाकार बैठकर गाता है और दूसरी कापालिक शैली जिसमें कलाकार खड़े होकर मंच पर अभिनय करता है। पुराने समय में इस कला पर पूरी तरह पुरुषों का एकाधिकार था और महिलाओं का शामिल होना वर्जित था। तीजन बाई ने इन नियमों को चुनौती दी और वे कापालिक शैली में पंडवानी गाने वाली पहली महिला कलाकार बनीं। अपनी बुलंद और कड़क आवाज के दम पर उन्होंने पुरुषों के इस गढ़ में अपनी अमिट छाप छोड़ी।

₹10 की पहली कमाई से लेकर देश की प्रधानमंत्री तक का सफर

महज 12 वर्ष की आयु में तीजन बाई का विवाह कर दिया गया था लेकिन पंडवानी गाने के कारण उनके ससुराल और समाज में भारी विरोध हुआ। 13 साल की उम्र में उन्होंने अपने पति का घर छोड़ दिया और एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर अकेले रहने लगीं। इसी उम्र में उन्होंने दुर्ग जिले के चंद्रखुरी गांव के सतीचौरा चौक पर अपना पहला सार्वजनिक मंचन किया। इस कार्यक्रम के लिए उन्हें पारिश्रमिक के रूप में सिर्फ 10 रुपए मिले थे। यह कार्यक्रम स्थानीय मालगुजार भूषण लाल देशमुख के सहयोग से हुआ था जिन्हें तीजन बाई आदर से दाऊ कहती थीं। इसके बाद उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से वाद्ययंत्रों के साथ गाने का हुनर सीखा।

जब रंगकर्मी हबीब तनवीर और श्याम बेनेगल ने पहचाना हुनर

भोपाल के भारत भवन में प्रस्तुति के दौरान देश के मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर की नजर तीजन बाई की अनूठी कला पर पड़ी। वह उनके अभिनय और गायन की ऊर्जा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तीजन बाई को दिल्ली आमंत्रित किया। इसके बाद उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति देने का ऐतिहासिक अवसर मिला। जब इंदिरा गांधी ने उनसे कहा कि आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं, तो तीजन बाई ने तपाक से जवाब दिया था कि मैं महाभारत करती नहीं हूं बल्कि महाभारत की कथा सुनाती हूं। बाद में प्रसिद्ध निर्देशक श्याम बेनेगल ने अपने धारावाहिक भारत एक खोज में उन्हें महाभारत प्रसंग के लिए शामिल किया जिससे वे घर-घर में लोकप्रिय हो गईं।

सामाजिक बहिष्कार और टूटी शादियों का सहा दर्द

एक महिला होकर खुले मंच पर खड़े होकर पंडवानी गाने की वजह से तीजन बाई को अपने ही पारधी समाज से निष्कासित कर दिया गया था। शुरुआती दिनों में उनके पास रहने को घर और खाने को बर्तन तक नहीं थे, उन्होंने पड़ोसियों से मदद लेकर अपना जीवन आगे बढ़ाया लेकिन गाना कभी नहीं छोड़ा। उनके इस सफर में तीन जीवनसाथियों ने उनका साथ छोड़ा और उनकी शादियां टूट गईं। निजी जीवन में उन्होंने अपने दो बेटों और एक गोद ली हुई बेटी को भी खो दिया। इन तमाम दुखों के बावजूद उन्होंने अपनी कला को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। बाद में उन्होंने अपनी ही मंडली के हारमोनियम वादक तुक्का राम से प्रेम विवाह किया।

पद्म विभूषण से लेकर मानद डी लिट की उपाधियों से सम्मान

तीजन बाई की अद्भुत प्रतिभा और लोक कला में उनके अद्वितीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के कई सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा। उन्हें साल 1988 में पद्म श्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। इसके बाद साल 2019 में उन्हें देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया। कला के क्षेत्र में उनकी इस ऊंचाइयों को देखते हुए बिलासपुर विश्वविद्यालय ने साल 2003 में और पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर ने साल 2006 में उन्हें डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फुकुओका पुरस्कार भी मिला।

हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा तो कभी अर्जुन का धनुष

तीजन बाई की प्रस्तुति का अंदाज सबसे जुदा था। जब वे मंच पर उतरती थीं, तो उनके हाथ में मौजूद तंबूरा या एकतारा महज एक वाद्ययंत्र नहीं रह जाता था। कथा के प्रसंग के अनुसार वह तंबूरा कभी भीम की गदा का रूप ले लेता था, तो कभी अर्जुन का धनुष या रथ बन जाता था। कभी-कभी वे उसी तंबूरे से द्रौपदी के बालों का दृश्य जीवंत कर देती थीं। उनके गाए प्रसंगों में द्रौपदी चीरहरण, दुशासन वध और भीष्म-अर्जुन युद्ध को दर्शक आज भी याद करते हैं। वे कभी लिखी हुई स्क्रिप्ट देखकर नहीं गाती थीं बल्कि कथा के बीच-बीच में समकालीन सामाजिक और स्त्री संघर्ष के मुद्दों पर भी अपनी बेबाक टिप्पणियां जोड़ती चलती थीं।

एम्स रायपुर में ली अंतिम सांस, पीएम मोदी ने भी जताया था शोक

पिछले कुछ समय से तीजन बाई अस्वस्थ चल रही थीं और व्हीलचेयर पर थीं। उनके स्वास्थ्य को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गहरी चिंता व्यक्त की थी। साल 2025 में प्रधानमंत्री ने स्वयं तीजन बाई की बहू वेणू देशमुख को फोन कर उनके स्वास्थ्य का हालचाल जाना था और उन्हें देश की अमूल्य धरोहर बताते हुए बेहतर इलाज का भरोसा दिया था। तीजन बाई ने अपने आखिरी दिनों में लेखकों से कहा था कि पंडवानी पर और लिखा जाना चाहिए ताकि यह कला आगे बढ़ती रहे। 5 जुलाई 2026 को एम्स रायपुर में डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका और वे पंचतत्व में विलीन हो गईं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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