
Madrasa Vande Mataram Order Muslim Students: पश्चिम बंगाल के सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों और उर्दू माध्यम के स्कूलों में प्रार्थना के समय राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को गाना अनिवार्य कर दिया गया है। सरकार के इस नए आदेश के बाद राज्य के विभिन्न जिलों में स्थित लगभग 614 मदरसों के पांच लाख से अधिक छात्र इस गीत को याद करने के लिए कड़ा अभ्यास कर रहे हैं। हालांकि भाषा के अंतर और स्कूलों में बुनियादी संसाधनों की कमी के कारण जमीनी स्तर पर शिक्षकों और बच्चों को भारी व्यावहारिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
बंगाल के सरकारी मदरसों में राष्ट्रगीत अनिवार्य होने के बाद जमीनी स्तर पर बड़ी चुनौतियां
राज्य में राजनीतिक बदलाव के बाद पहली बार बनी नई व्यवस्था के तहत स्कूल शिक्षा विभाग ने 19 मई को एक बड़ा आदेश जारी किया था। इस सरकारी आदेश के अनुसार सभी मान्यता प्राप्त मदरसों में सुबह की प्रार्थना के समय वंदे मातरम् के सभी 6 अंतरों का गायन अनिवार्य किया गया है। चूंकि यह आदेश गर्मी की छुट्टियों के दौरान आया था, इसलिए स्कूल खुलने के बाद अब मैदानी स्तर पर इस नियम को लागू कराने के लिए शिक्षक बच्चों को रोजाना विशेष तैयारी करवा रहे हैं।
देवकुंडा मदरसे में सिर्फ शुरुआती दो अंतरे ही गा पा रहे हैं बच्चे
मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में स्थित देवकुंडा हाई मदरसे में सुबह की प्रार्थना सभा का नजारा बदला हुआ नजर आता है। यहां करीब 200 बच्चे कतारों में खड़े होकर राष्ट्रगीत सीखने की कोशिश कर रहे हैं। संस्था के प्रधानाध्यापक मोहम्मद खसरू अहमद माइक पर बच्चों को बांग्ला भाषा में निर्देश देकर शांत कराते हैं और फिर लाउडस्पीकर पर वंदे मातरम् बजाया जाता है। प्रधानाध्यापक ने बताया कि फिलहाल बच्चे इस गीत को नए सिरे से सीख रहे हैं, इसलिए अभी प्रार्थना में केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जा रहे हैं।
उर्दू माध्यम के स्कूलों में संस्कृत के कठिन शब्दों को समझने में आ रही दिक्कत
आसनसोल के रेलपार क्षेत्र में स्थित रहमानिया हायर सेकेंडरी स्कूल जैसे उर्दू माध्यम के संस्थानों में यह समस्या अधिक गंभीर है। यहां पढ़ने वाले अधिकांश मुस्लिम बच्चे केवल उर्दू और स्थानीय बोली ही समझते हैं। उनके लिए हिंदी या बांग्ला पढ़ पाना भी काफी मुश्किल होता है। ऐसे में पूरी तरह संस्कृत निष्ठ शब्दों वाले वंदे मातरम् का उच्चारण करना इन छोटे बच्चों के लिए एक बेहद कठिन काम साबित हो रहा है।
मोबाइल फोन पर यूट्यूब के जरिए राष्ट्रगीत सुनाकर याद कराने की अनोखी कोशिश
रहमानिया स्कूल के वरिष्ठ सहायक शिक्षक बख्तियार आलम ने बताया कि बच्चों को तुरंत पूरा गीत याद कराना बेहद कठिन है। इसके समाधान के लिए शिक्षक अपनी जेब से मोबाइल फोन निकालकर यूट्यूब पर वंदे मातरम् का ऑडियो प्ले करते हैं और उसे लाउडस्पीकर के पास रख देते हैं। बच्चे पहले इस धुन को ध्यान से सुनते हैं और फिर गणित के पहाड़ों की तरह इसके एक-एक शब्द को रटने का प्रयास करते हैं।
सैयद नजरुल इस्लाम मदरसे में बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच चल रहा अभ्यास
आसनसोल के ही सैयद नजरुल इस्लाम जूनियर हाई मदरसे की माली हालत बहुत ज्यादा खराब है। इस स्कूल में बच्चों की संख्या के अनुपात में क्लासरूम और खुले मैदान की भारी कमी है। यहां तक कि सुबह की प्रार्थना के लिए भी कोई असेंबली ग्राउंड नहीं है, जिसके चलते बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में ही खड़े होकर प्रार्थना में शामिल होते हैं। बिजली की कटौती और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच शिक्षक जैसे-तैसे इस नए सरकारी आदेश का पालन कराने में जुटे हैं।
जर्जर भवनों और शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं सीमावर्ती इलाकों के स्कूल
इस मदरसे के शिक्षक सैयद कबीरुद्दीन अहमद ने बताया कि साल 2011 में जब स्कूल शुरू हुआ था तब यहां 200 छात्र और पर्याप्त स्टाफ था। आज छात्रों की संख्या बढ़कर एक हजार के करीब पहुंच चुकी है, लेकिन शिक्षकों की संख्या जस की तस बनी हुई है। स्कूल में बिजली नहीं होने के कारण भीषण गर्मी में छात्राएं कॉपियों से हवा करने को मजबूर हैं। स्टाफ रूम के नाम पर एक जर्जर झोपड़ीनुमा कमरा है जिसकी छत पर प्लास्टिक डालकर पानी रोका जाता है।
दुर्गापुर के एक ही कमरे में तीन क्लास के बच्चे साथ बैठकर पढ़ रहे राष्ट्रगीत
दुर्गापुर के झांझरा स्थित प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूल में भी प्रशासनिक और ढांचागत कमियां साफ नजर आती हैं। यहां एक ही छोटे से कमरे के भीतर कक्षा छठवीं, सातवीं और आठवीं के बच्चों को एक साथ बैठाकर पढ़ाया जाता है। स्कूल के हेडमास्टर मनोज कुमार मंडल ने बताया कि साल 2019 से शुरू हुए इस स्कूल में केवल दो ही शिक्षक कार्यरत हैं। शिक्षकों की कमी के बावजूद एक शिक्षिका को विशेष रूप से बच्चों को लिखकर राष्ट्रगीत याद कराने की जिम्मेदारी दी गई है।
इमाम संगठन ने फैसले पर जताई असहमति, सारे जहां से अच्छा गाने का दिया सुझाव
सरकारी फैसले पर मुस्लिम धार्मिक गुरुओं और सामाजिक संगठनों की राय बंटी हुई है। ऑल इंडिया इमाम मुअज्जिन एंड सोशल वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन के प्रदेश अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद शाकिफ कासमी ने इस आदेश पर अपनी असहमति जताई है। उनका कहना है कि इस गीत से कुछ मुस्लिम परिवारों की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं। कासमी ने सुझाव दिया कि वंदे मातरम् की जगह सरकार को ‘सारे जहां से अच्छा’ या राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ को ही अनिवार्य रखना चाहिए था जिससे किसी प्रकार का विवाद खड़ा न हो।



