
छत्तीसगढ़ में अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे अतिथि शिक्षकों का गुस्सा अब पूरी तरह सातवें आसमान पर पहुंच गया है। राज्य अतिथि शिक्षक विद्या मितान संघ के बैनर तले अपनी नौकरी के नियमितीकरण और सेवा सुरक्षा की मांग को लेकर शुरू की गई अनिश्चितकालीन हड़ताल सोमवार को 13वें दिन भी लगातार जारी रही। अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए प्रदेश भर से जुटे हजारों की संख्या में अतिथि शिक्षक पहले दुर्ग जिले के हिंदी भवन में एकत्रित हुए और फिर वहां से एकजुट होकर राजधानी रायपुर में विधानसभा का घेराव करने के लिए पैदल ही मार्च पर निकल पड़े।
रोजगार की स्थिरता और समान वेतन की मांग को लेकर सड़क पर उतरे हजारों विद्या मितान
आंदोलनकारी अतिथि शिक्षकों की मांगें मुख्य रूप से उनके भविष्य को सुरक्षित करने से जुड़ी हुई हैं। विद्या मितान संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि वे लंबे समय से बेहद कम मानदेय पर काम कर रहे हैं। उनकी मुख्य मांगों में नौकरी का नियमितीकरण, समान कार्य के बदले समान वेतन की व्यवस्था, नौकरी से न निकाले जाने की सेवा सुरक्षा गारंटी और भविष्य में रोजगार की स्थिरता शामिल है। शिक्षकों का कहना है कि वे सालों से आश्वासन के भरोसे बैठे हैं लेकिन अब तक सरकार ने उनके हित में कोई भी ठोस और लिखित नीतिगत फैसला नहीं लिया है।
जेल तिराहा चौक पर पुलिस ने लगाया तगड़ा पहरा, बैरिकेड पार करने के प्रयास में हुई झूमा-झटकी
हजारों की तादाद में पैदल मार्च कर रहे शिक्षकों के इस बड़े आंदोलन को देखते हुए दुर्ग और रायपुर पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। जैसे ही प्रदर्शनकारी शिक्षकों का यह हुजूम आगे बढ़ता हुआ जेल तिराहा चौक के पास पहुंचा, वहां पहले से तैनात भारी पुलिस बल ने लोहे के मजबूत बैरिकेड्स लगाकर पूरे रास्ते को ब्लॉक कर दिया। इस दौरान कुछ उत्साहित शिक्षकों ने जब बैरिकेड को पार कर आगे बढ़ने की कोशिश की, तो पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच हल्की धक्का-मुक्की और झूमा-झटकी की स्थिति भी निर्मित हो गई। हालांकि कुछ ही देर बाद शिक्षकों ने सड़क पर बैठकर ही बेहद अनुशासित ढंग से अपना विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया।
बस्तर और सरगुजा जैसे दूरस्थ आदिवासी अंचलों में 11 वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं ये विशेषज्ञ शिक्षक
संघ के प्रांतीय नेताओं ने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा कि वे पिछले लगभग 11 सालों से राज्य के अलग-अलग शासकीय स्कूलों में अपनी सेवाएं पूरी ईमानदारी से दे रहे हैं। गणित, विज्ञान, भौतिकी, रसायन और अंग्रेजी जैसे कठिन विषयों के ये विशेषज्ञ शिक्षक मैदानी इलाकों के साथ-साथ बस्तर और सरगुजा संभाग के उन घोर नक्सल प्रभावित और दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों को संभाल रहे हैं, जहां कोई भी नियमित शिक्षक अपनी पोस्टिंग नहीं कराना चाहता। इतनी कठिन परिस्थितियों में काम करने के बाद भी आज उनका खुद का भविष्य पूरी तरह से अंधकार में लटका हुआ है।
बार-बार गुहार लगाने के बाद भी नहीं हुआ कोई फैसला, परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट
अतिथि शिक्षकों का आरोप है कि उन्होंने अपनी मांगों को लेकर पूर्ववर्ती सरकार से लेकर वर्तमान साय सरकार के मंत्रियों और आला अधिकारियों तक कई बार लिखित में गुहार लगाई है। बार-बार ज्ञापन सौंपने के बाद भी शासन स्तर पर उनकी मांगों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। किसी भी तरह का ठोस निर्णय न होने से राज्य भर के हजारों अतिथि शिक्षकों और उन पर निर्भर उनके बूढ़े माता-पिता और बच्चों के सामने अब रोजी-रोटी का एक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। इसी निराशा और मानसिक तनाव के कारण उन्हें मजबूरन पढ़ाई छोड़कर मानसून सत्र के दौरान सड़कों पर उतरना पड़ा है।
1 जुलाई से जारी अनिश्चितकालीन हड़ताल के कारण सरकारी स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था पूरी तरह चरमराई
विद्या मितान संघ ने साफ तौर पर कहा कि 1 जुलाई से शुरू हुई इस अनिश्चितकालीन हड़ताल का सीधा असर अब सूबे की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर दिखने लगा है। प्रदेश के कई सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के शासकीय हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों में विज्ञान और अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों की पढ़ाई पूरी तरह से ठप हो गई है, क्योंकि इन स्कूलों का पूरा दारोमदार इन्हीं अतिथि शिक्षकों के कंधों पर टिका हुआ था। शिक्षकों ने साफ कर दिया है कि जब तक मुख्यमंत्री या शिक्षा मंत्री खुद आकर उनकी मांगों पर कोई स्पष्ट और समयबद्ध फैसला नहीं लेते, तब तक उनका यह आंदोलन और स्कूलों में कार्यबहिष्कार अनवरत रूप से जारी रहेगा।



