
CG Employees Regularization News: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में वर्षों से सेवाएं दे रहे 108 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण के मामले में उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत और उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी कर्मचारियों को पूर्ण सेवा लाभ न मिलने के कारण दायर अवमानना याचिका पर यह आदेश आया है। अदालत ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. अश्वनी दीक्षित को आगामी सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल को भी अपना लिखित शपथ पत्र प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।
वर्ष 2008 के नियमितीकरण आदेश से शुरू हुआ था कानूनी विवाद
GGU Bilaspur Employee Regularization Hearing: इस पूरे विवाद की नींव वर्ष 2008 में पड़ी थी, जब राज्य सरकार ने 10 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके दैनिक वेतनभोगी कर्मियों को परमानेंट करने का नीतिगत फैसला लिया था। इस नीति के तहत विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. एलएम मालवीय ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को नियमित करने का आदेश जारी कर दिया था। हालांकि, वर्ष 2009 में जब इस संस्थान को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला, तब तत्कालीन प्रबंधन ने इस पुराने नियमितीकरण आदेश को निरस्त कर दिया। इसके बाद से ही प्रभावित कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं।
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार के हलफनामे पर व्यक्त की गहरी असंतुष्टि
Guru Ghasidas University Staff Dispute: मामले की पिछली सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार से विस्तृत जवाब मांगा था। हालिया सुनवाई में अदालत ने पेश किए गए हलफनामे को अपर्याप्त और असंतोषजनक माना। अदालत का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने केवल सेवानिवृत्ति के बकाया भुगतानों का जिक्र किया, जबकि कर्मचारियों को मिलने वाले नियमित वेतनमान, पेंशन और अन्य वैधानिक सुविधाओं के संबंध में कोई स्पष्ट ब्योरा नहीं दिया गया। इसी ढिलाई को अवमानना मानते हुए अदालत ने रजिस्ट्रार की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य कर दी है।
कम वेतन दिए जाने को लेकर कर्मचारियों ने कोर्ट के सामने रखी बात
GGU Bilaspur Regularization News: याचिकाकर्ता कर्मचारियों की ओर से पैरवी करते हुए बताया गया कि कागजों पर नियमित करने की बात कहने के बावजूद उन्हें पूर्ण वेतनमान का भुगतान नहीं किया जा रहा है। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें केवल एक महीने का मनमाना वेतन दिया गया। इसके अलावा, अलग-अलग पदों और श्रेणियों में कार्यरत होने के बावजूद सभी कर्मचारियों को एक समान चतुर्थ श्रेणी मानकर मानदेय तय कर दिया गया, जो पूरी तरह अनुचित है।
फंड की कमी का हवाला देकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने झाड़ा पल्ला
Contractual Employees Pay Scale Crisis: वेतनमान में आ रही विसंगतियों पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने धन की कमी को मुख्य कारण बताया है। संस्थान की ओर से तर्क दिया गया है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से पर्याप्त बजटीय आवंटन प्राप्त नहीं होने की वजह से पूर्ण वेतन जारी करने में व्यावहारिक कठिनाइयां आ रही हैं। हालांकि, कर्मचारियों का कहना है कि अदालती आदेशों के पालन में वित्तीय संकट का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
2 सितंबर की अगली सुनवाई पर टिकीं सभी पक्षों की निगाहें
Bilaspur High Court Contempt Case: इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब अगली सुनवाई 2 सितंबर को तय की गई है। उस दिन रजिस्ट्रार की व्यक्तिगत मौजूदगी और कुलपति द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले शपथ पत्र के आधार पर अदालत अपना आगे का रुख तय करेगी। वर्षों से नियमितीकरण और समान कार्य के लिए समान वेतन की आस लगाए बैठे 108 परिवारों के लिए यह फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



