
छत्तीसगढ़ सरकार की महत्वाकांक्षी महतारी वंदन योजना को लेकर खैरागढ़ जिले से एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है। महिलाओं को आर्थिक सहायता देने वाली इस योजना के तहत चल रहे ई-केवाईसी (E-KYC) सत्यापन अभियान के दौरान पता चला है कि एक पुरुष को कागजों में महिला हितग्राही मानकर महीनों तक उसके खाते में राशि भेजी जाती रही। इस खुलासे के बाद योजना के जमीनी क्रियान्वयन और आवेदन की जांच करने वाले सरकारी अमले की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रशासन अब इस गड़बड़ी के सामने आने के बाद मामले को दबाने और राशि की वसूली करने में जुट गया है।
ट्रायल के लिए भरा था फॉर्म और खाते में आने लगी योजना की सरकारी राशि
यह पूरा मामला खैरागढ़ विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम मुढ़ीपार का है। यहां रहने वाले तिलोक साहू नामक एक युवक ने इस गड़बड़ी की पूरी कहानी बताई। तिलोक गांव में ही एक कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) का संचालन करता है। जब सरकार द्वारा महतारी वंदन योजना का नया ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया गया, तब वह केवल आवेदन की तकनीकी प्रक्रिया को समझने और सॉफ्टवेयर का ट्रायल लेने के लिए फॉर्म भर रहा था। उसने बिना किसी दस्तावेजी कूटरचना के पूरी तरह से अपने ही नाम और विवरण का उपयोग करके फॉर्म को सबमिट कर दिया था।
खुद के नाम के आगे ही लिख दिया पति का नाम, फिर भी मिल गई मंजूरी
सॉफ्टवेयर की खामी और जांच अधिकारियों की लापरवाही का स्तर इस बात से समझा जा सकता है कि तिलोक साहू ने आवेदन पत्र में महिला हितग्राही के कॉलम में भी अपना ही नाम लिखा था और उसके ठीक नीचे पति के नाम वाले कॉलम में भी स्वयं का ही नाम दर्ज किया था। नियमतः इस तरह के विसंगतिपूर्ण आवेदन को कंप्यूटर सिस्टम या शुरुआती जांच में ही निरस्त हो जाना चाहिए था। इसके विपरीत, इस त्रुटिपूर्ण फॉर्म को न केवल स्वीकार किया गया बल्कि इसे पूरी तरह वैध मानकर योजना के लाभार्थियों की मुख्य सूची में भी शामिल कर लिया गया।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से लेकर सुपरवाइजर तक दो स्तर की जांच हुई फेल
इस योजना के नियमों के अनुसार किसी भी आवेदन को अंतिम मंजूरी मिलने से पहले कई चरणों की कड़ी प्रशासनिक जांच से गुजरना पड़ता है। ऑनलाइन रिकॉर्ड की पड़ताल से पता चला है कि तिलोक साहू का आवेदन ‘पब्लिक’ केटेगरी से सीधे पोर्टल पर दर्ज हुआ था। इसके बाद तय प्रक्रिया के तहत संबंधित क्षेत्र की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने इस फॉर्म का भौतिक और दस्तावेजी सत्यापन किया। आंगनबाड़ी स्तर से हरी झंडी मिलने के बाद यह फाइल आगे बढ़ी और सेक्टर सुपरवाइजर ने भी बिना किसी आपत्ति के इसे अपने स्तर पर अंतिम मंजूरी दे दी।
10 किस्तें मिलने का दावा, सरकारी रिकॉर्ड में 12 महीने तक भुगतान की बात आई सामने
इस मामले के उजागर होने के बाद जब तिलोक साहू से पूछताछ की गई, तो उसने स्वीकार किया कि उसे इस फॉर्म के आधार पर कुल 10 किस्तों की राशि प्राप्त हुई थी। उसका दावा है कि भूल का अहसास होने पर उसने यह पूरी रकम विभाग को वापस लौटा दी है। दूसरी तरफ, महिला एवं बाल विकास विभाग के ऑनलाइन भुगतान रिकॉर्ड और बैंक स्टेटमेंट कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, इस पुरुष आवेदक के बैंक खाते में पूरे 12 महीनों तक लगातार योजना की राशि नियमित रूप से ट्रांसफर की जाती रही।
खैरागढ़ परियोजना अधिकारी ने शुरू की रिकवरी, अब तक 10 हजार रुपये वसूल
खैरागढ़ की परियोजना अधिकारी रंजना श्रीवास्तव ने इस पूरे घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए बताया कि मामला संज्ञान में आते ही संबंधित व्यक्ति के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई शुरू कर दी गई है। गलत तरीके से भुगतान की गई राशि की वसूली के लिए नोटिस जारी किया गया था। अधिकारी के अनुसार, अब तक कुल 10 हजार रुपये की रिकवरी की जा चुकी है। चूंकि रिकॉर्ड में 12 महीनों तक भुगतान होने की जानकारी दर्ज है, इसलिए शेष बची हुई अतिरिक्त राशि को भी राजकोष में वापस जमा कराने की विधिक प्रक्रिया तेजी से चल रही है।
ई-केवाईसी अभियान से खुली पोल, तीन जिलों में हजारों आवेदकों का सत्यापन बाकी
यह पूरी वित्तीय अनियमितता तब जाकर पकड़ी गई जब शासन के निर्देश पर संभाग के जिलों में महतारी वंदन योजना के लाभार्थियों का व्यापक ई-केवाईसी अभियान शुरू किया गया। राजनांदगांव, मोहला-मानपुर-चौकी और खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिलों को मिलाकर कुल 2,40,996 महिलाओं की ई-केवाईसी करने का विभागीय लक्ष्य तय किया गया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक जून महीने तक 2,36,886 लोगों का सत्यापन पूरा हो चुका है, जबकि 10,222 से अधिक मामलों की जांच अभी बाकी है, जिसे अगस्त तक पूरा करने की समय-सीमा तय की गई है।
98 प्रतिशत काम पूरा होने का दावा, लेकिन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि तीन जिलों के इस क्लस्टर में अब तक लगभग 98 प्रतिशत हितग्राहियों का सफलतापूर्वक डेटा सत्यापन किया जा चुका है। भले ही प्रशासनिक तौर पर इस आंकड़े को एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा हो, लेकिन खैरागढ़ के इस अकेले मामले ने पूरी सत्यापन व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। अब स्थानीय लोगों और आम नागरिकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस खुली लापरवाही के लिए जिम्मेदार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सुपरवाइजर के खिलाफ प्रशासन क्या दंडात्मक कार्रवाई करता है।



