
CG Midday Meal Cook Strike 2026: छत्तीसगढ़ में नए शैक्षणिक सत्र का आगाज होते ही स्कूली बच्चों के दोपहर के खाने यानी मध्यान्ह भोजन योजना पर संकट के बादल छाने लगे हैं. प्रदेशभर के सरकारी स्कूलों में भोजन पकाने वाले रसोइयों ने अपनी मांगों को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. स्कूल मध्यान्ह भोजन रसोइया कल्याण संयुक्त संघ ने साफ शब्दों में अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि यदि उनकी लंबित मांगों पर जल्द ही कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया, तो 1 जुलाई 2026 से पूरे सूबे के सरकारी स्कूलों में चूल्हे ठंडे पड़ जाएंगे और भोजन बनाना पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा. रसोइयों का आरोप है कि सालों से बहुत कम पैसों में काम कराने के बाद भी सरकार उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रही है.
धमतरी के गांधी मैदान में जुटे सैकड़ों रसोइया, आंदोलन को धार देने बनाई मजबूत रणनीति
इस बड़े आंदोलन की सुगबुगाहट धमतरी जिले से शुरू हुई है. रविवार को धमतरी के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जिलेभर से आए सैकड़ों रसोइया कर्मियों की एक बड़ी बैठक आयोजित की गई. इस बैठक में शामिल हुए कर्मचारियों ने सरकार के रवैये को लेकर भारी नाराजगी जताई. संघ के पदाधिकारियों ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि लंबे समय से अपनी सेवाएं देने के बावजूद रसोइया वर्ग को लगातार उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है. इसी को देखते हुए अब आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए ब्लॉक से लेकर जिला स्तर तक रणनीति तैयार कर ली गई है.
1995 से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों को अब तक नहीं मिला स्थायित्व, सम्मानजनक मानदेय की आस
रसोइया संघ के संरक्षक हीराचंद यादव, प्रदेश अध्यक्ष राजराज कश्यप और मेघराज कोशल ने संयुक्त रूप से बताया कि छत्तीसगढ़ के स्कूलों में कई रसोइया साल 1995 से लगातार अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इसके बाद भी आज तक न तो उनकी नौकरी को स्थाई किया गया है और न ही उन्हें सम्मानजनक मानदेय मिल पा रहा है. महंगाई के इस दौर में बेहद कम मानदेय मिलने से उनके सामने परिवार पालने का संकट खड़ा हो गया है. इतने सालों की निष्ठा के बदले शासन से सिर्फ आश्वासन मिलने के कारण ही कर्मचारियों में यह आक्रोश पनपा है.
बिना वजह नौकरी से निकालने का आरोप, स्वयं सहायता समूहों की मनमानी से कर्मचारी परेशान
बैठक के दौरान रसोइयों ने अपने स्थानीय अधिकारियों और व्यवस्थापकों पर प्रताड़ना के गंभीर आरोप भी लगाए. कर्मचारियों का कहना है कि कई स्कूलों में स्वयं सहायता समूहों की मनमानी चल रही है. स्थानीय स्तर पर सांठगांठ करके सालों से काम कर रहे अनुभवी रसोइयों को अचानक नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. इसके अलावा कई जगहों पर स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने का बहाना बनाकर भी पुराने कर्मचारियों को सेवामुक्त किया जा रहा है, जिससे उनकी रोजी-रोटी छिन रही है.
जून महीने के शुरुआती 15 दिनों का नहीं मिलता पैसा, मुफ्त में काम कराने का दर्द छलका
कर्मचारियों ने अपनी एक और बड़ी व्यावहारिक समस्या को उजागर करते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ में हर साल गर्मी की छुट्टियों के बाद 16 जून से स्कूल दोबारा खुल जाते हैं. नियम के मुताबिक रसोइया भी 16 जून से ही अपनी ड्यूटी पर तैनात हो जाते हैं और बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन बनाना शुरू कर देते हैं. इसके बावजूद शिक्षा विभाग द्वारा उन्हें 16 जून से 30 जून तक की इस 15 दिनों की अवधि का कोई मानदेय या पैसा नहीं दिया जाता. इस तरह हर साल उनसे आधे महीने मुफ्त में काम कराया जाता है जिसे अब वे बर्दाश्त नहीं करेंगे.
कलेक्टर दर और पूर्णकालिक दर्जे की मांग, आर-पार की लड़ाई के मूड में आए संगठन
आंदोलन पर आमादा रसोइया संघ ने सरकार के सामने अपनी प्रमुख मांगें बहुत स्पष्ट रूप से रख दी हैं. उनकी सबसे बड़ी मांग है कि रसोइयों को अंशकालिक (पार्ट-टाइम) कर्मचारी के बजाय पूर्णकालिक (फुल-टाइम) का दर्जा दिया जाए. इसके साथ ही मासिक मानदेय को वर्तमान व्यवस्था से हटाकर सीधे कलेक्टर दर (न्यूनतम मजदूरी अधिनियम) के दायरे में लाया जाए, जिससे उन्हें एक सुरक्षित और निश्चित आय मिल सके. संघ ने नौकरी की सुरक्षा की गारंटी देने के लिए ठोस नीति बनाने का भी आग्रह किया है.
मांगें पूरी न होने पर पूरे छत्तीसगढ़ में ठप होगा काम, बड़ी संख्या में एकजुट हुए सदस्य
धमतरी की इस सभा में नमिता पटेल, ईश्वरी नेताम, श्यालाल मरकाम, चंद्रवती, रेखा, लीलाराम, यशवंत यादव, देवकी बाई और चंद्रिका नेताम सहित भारी संख्या में महिला और पुरुष रसोइया शामिल हुए. संगठन के नेताओं ने दोटूक शब्दों में कहा है कि यदि 1 जुलाई से पहले शासन स्तर पर उनकी मांगों का निराकरण नहीं होता है, तो इस विरोध प्रदर्शन को पूरे प्रदेश में फैलाया जाएगा. सभी जिलों के रसोइया एक साथ हड़ताल पर चले जाएंगे, जिससे राज्य की पूरी मध्यान्ह भोजन व्यवस्था ठप हो जाएगी और इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी.



