
छत्तीसगढ़ के स्कूली शिक्षा तंत्र में एक ऐसा घोटाला सामने आया है जिसने हजारों अभिभावकों की जेब और लाखों बच्चों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। राज्य के सैकड़ों निजी स्कूल छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल (CG Board) से मान्यता लेकर धड़ल्ले से ‘CBSE पैटर्न’ का झांसा दे रहे हैं। बिना किसी आधिकारिक संबद्धता के ये स्कूल ऊँची फीस, महंगी NCERT किताबें और विशेष ड्रेस के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये की अवैध वसूली कर रहे हैं। अब जब बोर्ड परीक्षाओं का समय आया है, तब बच्चों को पता चल रहा है कि उन्हें परीक्षा तो सीजी बोर्ड की ही देनी है, जबकि साल भर उन्होंने दूसरा पाठ्यक्रम पढ़ा है।
आंकड़ों की जुबानी शिक्षा का खेल: 1784 स्कूलों ने नहीं लीं सरकारी किताबें
राज्य में कुल 57,053 स्कूलों का जाल बिछा है, जिनमें से 6,800 निजी क्षेत्र के हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पाठ्य पुस्तक निगम द्वारा जारी सूची के अनुसार, 1784 निजी स्कूलों ने शासन की ओर से मिलने वाली निशुल्क या रियायती किताबें ली ही नहीं हैं। इसकी जगह इन स्कूलों ने अभिभावकों पर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें थोप दी हैं। जिलों के अनुसार उन स्कूलों की संख्या नीचे दी गई है जिन्होंने बोर्ड की किताबें लेने से इनकार कर दिया:
- रायपुर व बिलासपुर: क्रमशः 107 और 157 स्कूलों ने बनाई दूरी।
- दुर्ग व जांजगीर-चांपा: यहाँ 135 और 106 स्कूल घेरे में हैं।
- आदिवासी क्षेत्र: सरगुजा (85) और जशपुर (72) में भी फर्जीवाड़ा जारी।
- अन्य जिले: रायगढ़ (73), कोरबा (89) और मुंगेली (74) में भी यही हाल है।
भविष्य अधर में: बिना पाठ्यपुस्तक के कैसे देंगे बोर्ड परीक्षा?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब इन 1700 से अधिक स्कूलों ने पूरे सत्र सीजी बोर्ड की अधिकृत पुस्तकों से पढ़ाई ही नहीं कराई, तो छात्र केंद्रीकृत परीक्षा कैसे दे पाएंगे? निजी प्रकाशकों की किताबों और सरकारी बोर्ड के पाठ्यक्रम में जमीन-आसमान का अंतर होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस विसंगति के कारण लाखों बच्चों का साल खराब होना लगभग तय है। शिक्षा विभाग की इस चुप्पी के पीछे अधिकारियों और स्कूल संचालकों की गहरी साठगांठ का आरोप लगाया जा रहा है।
हाई कोर्ट की शरण में अभिभावक: 2000 ‘फर्जी’ स्कूलों का जिक्र
छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन ने हार मानकर अब कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना है। हाई कोर्ट में दायर एक याचिका में सनसनीखेज उल्लेख किया गया है कि प्रदेश में लगभग 2,000 ऐसे स्कूल चल रहे हैं जो खुद को फर्जी तरीके से CBSE संबद्ध बताते हैं। याचिका में आरोप है कि:
- लग्जरी लाइफस्टाइल: स्कूल संचालक अभिभावकों से प्रीमियम फीस वसूलकर ऑडी और मर्सिडीज जैसी गाड़ियों में घूम रहे हैं।
- अधिकारियों का संरक्षण: रिश्वतखोर अधिकारियों की शह पर यह पूरा नेक्सस फल-फूल रहा है।
- RTE छात्रों की दुर्दशा: शिक्षा के अधिकार के तहत आने वाले गरीब बच्चों को भी 8,000 से 10,000 रुपये की महंगी किताबें खरीदने पर मजबूर किया जा रहा है।
विज्ञापन और प्रपत्र-1 में झांसा: ‘Likely to be Affiliated’ का मायाजाल
अभिभावकों को भ्रमित करने के लिए स्कूल संचालक प्रपत्र-1 और विज्ञापनों में चालाकी भरे शब्दों का प्रयोग करते हैं। वे अपनी मान्यता के कॉलम में “CBSE Pattern” या “Likely to be affiliated with CBSE” (CBSE से संबद्धता संभावित) जैसे शब्द लिखते हैं, जो कानूनी रूप से गलत है। छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष किष्टोफर पॉल का कहना है कि दर्जनों बार ज्ञापन देने के बाद भी विभाग ने इन स्कूलों के विज्ञापनों पर रोक नहीं लगाई, जिससे नए सत्र में भी अभिभावक इसी जाल में फंस रहे हैं।

शिक्षा सचिव को कोर्ट का अल्टीमेटम: 24 मार्च तक देना होगा जवाब
मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कड़ा रुख अपनाया है। विकास तिवारी द्वारा पेश की गई 1784 स्कूलों की सूची के आधार पर, कोर्ट ने स्कूल शिक्षा सचिव को 24 मार्च 2026 तक शपथ-पत्र (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने पूछा है कि बिना बोर्ड की किताबों के ये स्कूल छात्रों को परीक्षा के लिए कैसे तैयार कर रहे हैं। इस आदेश के बाद विभाग के भीतर हड़कंप मचा हुआ है और दोषी नोडल अधिकारियों पर गाज गिरनी तय मानी जा रही है।
पैरेंट्स एसोसिएशन के गंभीर आरोप: 33 राज्यों में छत्तीसगढ़ 32वें स्थान पर
पैरेंट्स एसोसिएशन का दावा है कि छत्तीसगढ़ में शिक्षा की गुणवत्ता राष्ट्रीय स्तर पर निचले पायदान (32वें स्थान) पर है, और इसका मुख्य कारण निजी स्कूलों की मनमानी है। एसोसिएशन ने अपनी मांगों की सूची प्रशासन को सौंपी है:
- मान्यता रद्द हो: फर्जी दावा करने वाले स्कूलों का नवीनीकरण तुरंत रोका जाए।
- पाठ्यक्रम की अनिवार्यता: सभी निजी स्कूलों में संबंधित बोर्ड की ही आधिकारिक किताबों से पढ़ाई सुनिश्चित हो।
- अधिकारियों पर FIR: फर्जी स्कूलों को संरक्षण देने वाले जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) पर कठोर कार्रवाई हो।
- फीस रिफंड: अतिरिक्त वसूली गई ‘पैटर्न फीस’ को अभिभावकों को वापस दिलाया जाए।
विभागीय आदेशों की धज्जियां: SCERT बनाम NCERT का विवाद
लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के पुराने आदेश स्पष्ट करते हैं कि सीजी बोर्ड के स्कूलों में केवल SCERT की किताबें ही चलेंगी। लेकिन हकीकत में, स्कूल संचालक प्राइवेट कमीशन के चक्कर में निजी पब्लिशर्स की किताबें चला रहे हैं। पैरेंट्स एसोसिएशन का कहना है कि जब तक जिला स्तर पर कड़े पर्यवेक्षण की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक बच्चों को ‘एक्सपेरिमेंटल लैब’ की तरह इस्तेमाल किया जाता रहेगा।
भविष्य की राह: क्या सुधरेगा छत्तीसगढ़ का शिक्षा तंत्र?
अब सबकी नजरें 24 मार्च को हाई कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। यदि सरकार इस बार भी सख्त कदम नहीं उठाती, तो लाखों छात्रों का भविष्य अंधकार में डूबना निश्चित है। अभिभावकों की मांग है कि शिक्षा विभाग को एक पारदर्शी पोर्टल बनाना चाहिए जहाँ हर स्कूल की वास्तविक मान्यता (Affiliation) और वहां चलने वाली किताबों की सूची सार्वजनिक हो, ताकि कोई भी स्कूल संचालक किसी को गुमराह न कर सके।



