
Chhattisgarhi Education Issue: राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर तक बच्चों को स्थानीय भाषा में शिक्षा देने का स्पष्ट प्रावधान है। छत्तीसगढ़ की वर्तमान कैबिनेट भी इस संबंध में प्रस्ताव पारित कर चुकी है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर अब तक छत्तीसगढ़ी को स्कूली शिक्षा का माध्यम नहीं बनाया जा सका है। राज्य निर्माण के 25 साल पूरे होने के बाद भी स्थानीय भाषा को उसका हक नहीं मिल पाया है। छत्तीसगढ़ी को शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए संघर्ष कर रहे ‘मोर चिन्हारी छत्तीसगढ़ी’ टीम के संरक्षक नंद किशोर शुक्ल ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
भाषायी आधार पर बने राज्य को मिला हिंदी भाषी का दर्जा
छत्तीसगढ़ राज्य का गठन मुख्य रूप से भाषायी और सांस्कृतिक विशिष्टता के आधार पर हुआ था। इसके बावजूद प्रशासनिक और शैक्षणिक स्तर पर छत्तीसगढ़ को विशुद्ध हिंदी भाषी राज्यों की सूची में शामिल रखा गया है। अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा होने के कारण यह क्षेत्र ‘क’ वर्ग के राज्यों में आता था। राज्य अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ी को व्यावहारिक भाषा के रूप में मान्यता देकर इसे ‘ख’ वर्ग में शामिल किया जाना था, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। तीन करोड़ से अधिक आबादी की पहचान होने के बाद भी यह भाषा स्कूलों से दूर है।

आठवीं अनुसूची में शामिल होना जरूरी नहीं
प्रदेश में मातृभाषा को लेकर आम जनता और व्यवस्था के बीच एक बड़ा भ्रम फैला हुआ है। मातृभाषा का अर्थ उस बोली से है जिसे बच्चा अपने घर और परिवेश में स्वाभाविक रूप से सीखता है। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी, हल्बी, गोंडी, कुड्डूक, सरगुजिहा और सदरी जैसी समृद्ध मातृभाषाएं हैं, लेकिन जनगणना के दौरान जागरूकता की कमी के कारण लोग अपनी भाषा हिंदी लिखवा देते हैं। संवैधानिक रूप से प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देना बच्चों का मूल अधिकार है और इसके लिए किसी भाषा का संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।
मुख्यमंत्री और मंत्रियों तक पहुंचाई गई मांग
स्थानीय भाषा को शिक्षा और प्रशासनिक कामकाज का हिस्सा बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इस संबंध में दो साल पहले सूबे के मुख्यमंत्री के सामने विस्तृत कार्ययोजना रखी गई थी। इसके साथ ही दोनों उपमुख्यमंत्रियों और शिक्षा मंत्री से भी अलग-अलग मुलाकातों में इस विषय पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है। यह मुहिम किसी अन्य भाषा के विरोध में नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य समाज में भाषायी सद्भाव और अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव जगाना है। जब तक स्कूलों में इसकी पढ़ाई शुरू नहीं होगी, तब तक भाषा को उसका वास्तविक स्थान नहीं मिल पाएगा।
एक भाषा के खत्म होने से मिट जाती है संस्कृति
किसी भी समाज की संस्कृति उसकी भाषा में रची-बसी होती है। यदि कोई भाषा विलुप्त होती है, तो उसके साथ पूरा सांस्कृतिक ताना-बाना और इतिहास भी समाप्त हो जाता है। इसी खतरे को देखते हुए यूनेस्को ने हर साल 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने का निर्णय लिया था। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 350 ‘क’ भी बच्चों को उनकी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने की वकालत करता है। छत्तीसगढ़ में इसे राजभाषा का दर्जा तो मिल गया, लेकिन जब तक मराठी, गुजराती या पंजाबी की तरह इसमें नियमित अध्यापन शुरू नहीं होता, तब तक राजभाषा का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।
सोशल मीडिया पर चलन बढ़ा पर हीन भावना अब भी कायम
छत्तीसगढ़ी के प्रचार-प्रसार के लिए जमीनी स्तर पर लंबे समय से प्रयास चल रहे हैं। इसके लिए पूर्व में पूरे राज्य में 4 हजार किलोमीटर की साइकिल यात्रा भी की जा चुकी है और दिल्ली के जंतर-मंतर पर सत्याग्रह के जरिए केंद्र का ध्यान खींचा गया था। वर्तमान में सोशल मीडिया पर छत्तीसगढ़ी का उपयोग जरूर बढ़ा है, लेकिन स्कूलों में पढ़ाई लिखाई का माध्यम न होने के कारण पढ़े-लिखे तबके में इसे लेकर अब भी एक हीन भावना दिखाई देती है। शहरीकरण के कारण घरों में हिंदी का चलन बढ़ा है, जिससे मूल लोकभाषाएं धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही हैं।



