Bastar Dhurwa Tribal Society Marriage Guidelines: शादियों पर डीजे, शराब और फिजूलखर्ची पर पूरी तरह रोक

Bastar Dhurwa Tribal Society Marriage Guidelines: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में धुरवा आदिवासी समाज ने सामाजिक सुधार और अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए एक बेहद कड़ा और बड़ा फैसला लिया है। जगदलपुर के तेतरकुटी स्थित सामाजिक भवन में आयोजित संभाग स्तरीय विशेष बैठक में सर्वसम्मति से विवाह समारोहों में होने वाले तड़क-भड़क और फिजूलखर्ची पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। समाज के प्रबुद्धजनों और पदाधिकारियों का कहना है कि शादियों में बढ़ता दिखावा गरीब परिवारों को कर्ज के दलदल में धकेल रहा है। इस सामाजिक कुप्रथा को रोकने और सादगी को बढ़ावा देने के लिए नए कड़े नियम लागू किए गए हैं, जिनका उल्लंघन करने पर सीधे जुर्माना लगाया जाएगा।

डीजे की जगह गूंजेंगे पारंपरिक ढोल और बांसुरी, नियमों को तोड़ने पर लगेगा आर्थिक दंड

धुरवा समाज की बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया है कि अब विवाह समारोहों या किसी भी सामाजिक मांगलिक कार्यक्रम में कानफोड़ू आवाज वाले आधुनिक डीजे (DJ) बजाने पर पूरी तरह पाबंदी रहेगी। तेज आवाज के संगीत के बजाय समाज अपनी मूल संस्कृति की ओर लौटेगा और शादियों में बस्तर के पारंपरिक वाद्ययंत्रों जैसे ढोल, टामक, टूड़बूड़ी, बांसुरी और जलाजल को बजाना अनिवार्य किया जाएगा। समाज ने चेतावनी दी है कि यदि किसी परिवार ने इन नियमों की अवहेलना की, तो उस पर तगड़ा आर्थिक जुर्माना लगाने के साथ ही उसका हुक्का-पानी बंद करने जैसा सामाजिक दंड भी दिया जाएगा।

अंग्रेजी शराब पर पूर्ण प्रतिबंध, केवल पूजा-पाठ में ही मिलेगी पारंपरिक पेय को सीमित अनुमति

नशामुक्त समाज के निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए बैठक में शराबबंदी को लेकर सबसे सख्त रुख अपनाया गया। अब धुरवा समाज के किसी भी कार्यक्रम में अंग्रेजी या अन्य व्यावसायिक शराब परोसना पूरी तरह गैरकानूनी माना जाएगा। समाज के पदाधिकारियों ने साफ किया है कि केवल पारंपरिक देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान ही समाज प्रमुखों (मांझी-चालकी) की पूर्व अनुमति से स्थानीय पारंपरिक पेय का बेहद सीमित और सांकेतिक उपयोग किया जा सकेगा। सामान्य भोज या स्वागत के दौरान किसी को भी नशा करने की इजाजत नहीं होगी।

महंगे तोहफों और अनिवार्य कपड़ा वितरण का दिखावा खत्म, वधू मूल्य की परंपरा रहेगी कायम

समाज ने शादी-ब्याह के दौरान रिश्तेदारों को महंगे कपड़े बांटने और उपहारों का दिखावा करने की कुप्रथा को हमेशा के लिए समाप्त करने का फैसला किया है। इसके स्थान पर अब केवल सादगीपूर्ण सामूहिक विवाह को प्रोत्साहित किया जाएगा। धुरवा आदिवासी समाज अब तक रिकॉर्ड 217 जोड़ों का सामूहिक आदर्श विवाह संपन्न करा चुका है, जिससे गरीब परिवारों के लाखों रुपये की बचत हुई है। पदाधिकारियों ने याद दिलाया कि धुरवा परंपरा में उत्तर भारत जैसी कोई दहेज प्रथा नहीं है, बल्कि यहां प्राचीन ‘वधू मूल्य’ की गौरवशाली परंपरा है, जिसमें वर पक्ष द्वारा अपनी मर्जी से वधू के परिवार को सम्मान स्वरूप आर्थिक या सामाजिक सहयोग दिया जाता है।

राजनीतिक दखल देने वाले पदाधिकारियों की सीधे होगी छुट्टी, शिक्षा और युवाओं पर रहेगा विशेष जोर

सामाजिक मंचों की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह भी तय किया गया कि यदि कोई पदाधिकारी नियमों के विरुद्ध जाकर अपनी कुर्सी का इस्तेमाल किसी राजनीतिक फायदे या दबाव के लिए करेगा, तो उसे तुरंत पद से बर्खास्त कर दिया जाएगा। समाज को और अधिक संगठित करने के लिए आगामी 24 मई को अधिकारी-कर्मचारी प्रकोष्ठ के गठन हेतु संभाग स्तरीय बैठक बुलाई गई है, जबकि 9 जून को नई संभागीय कार्यकारिणी का चुनाव होगा। धुरवा समाज बस्तर संभाग के महासचिव डॉ. गंगाराम कश्यप ने बताया कि उनका मुख्य लक्ष्य युवाओं को अनिवार्य शिक्षा से जोड़ना, सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना और रूढ़िवादी कुप्रथाओं को खत्म कर आगे बढ़ना है।

Also Read: Manendragarh Bride Lover Entry: शादी के अगले दिन दुल्हन के ससुराल पहुंचा प्रेमी: कहा- 3 साल से है रिलेशनशिप, रिसेप्शन की जगह थाने पहुंची बारात, फिर जो हुआ…

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button