छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे का काउंटडाउन: 52 घंटे, 17 नक्सली और अंतिम चेतावनी, सरेंडर या ‘द एंड’?

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई अब अपने निर्णायक मोड़ पर आ चुकी है। केंद्र सरकार द्वारा 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया गया है और इस समय सीमा को खत्म होने में अब महज 52 घंटे ही शेष हैं। कांकेर के घने जंगलों में अब केवल 17 नक्सली ही बचे हुए बताए जा रहे हैं। पुलिस और प्रशासन की ओर से कोशिशें तेज हो गई हैं कि ये बचे हुए लड़ाके भी मुख्यधारा में लौट आएं। पूरे क्षेत्र में हलचल तेज है और हर किसी की नजर इस बात पर टिकी है कि ये 17 नक्सली हथियार डालते हैं या सुरक्षा बल कोई बड़ा ऑपरेशन शुरू करेंगे।

डीवीसीएम चंदर और रूपी के सरेंडर की अटकलें

कांकेर के जंगलों में सक्रिय बचे हुए नक्सलियों में डीवीसीएम चंदर और एसीएम रूपी सबसे प्रमुख नाम हैं। पिछले एक हफ्ते से अफवाहों का बाजार गर्म है कि चंदर और रूपी अपनी पूरी टीम के साथ आत्मसमर्पण कर सकते हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर अभी तक उनके बाहर आने की पुष्टि नहीं हुई है। ये दोनों नक्सली कमांडर्स इस समय कंपनी नंबर 5 के कुछ सदस्यों के साथ जंगलों में भटक रहे हैं। पुलिस सूत्रों का कहना है कि वे छोटे-छोटे गुटों में बंट गए हैं, जिससे उन तक संदेश पहुँचाना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।

गोंडी भाषा में लिखा गया भावुक पत्र

इस बीच, एक दिन पहले ही सरेंडर करने वाले तीन नक्सलियों—रेनू, राधिका और संजू ने अपने पुराने साथियों के लिए एक बेहद भावुक पत्र लिखा है। गोंडी भाषा में लिखे गए इस संदेश में उन्होंने चंदर और रूपी से अपील की है कि हिंसा का रास्ता अब पूरी तरह बेमानी हो चुका है। पत्र में लिखा गया है कि अब हथियार छोड़कर अपने परिवार के साथ समय बिताने का सही वक्त आ गया है। इस पत्र में परतापुर थाना प्रभारी का मोबाइल नंबर भी साझा किया गया है ताकि वे सुरक्षित वापसी के लिए सीधे संपर्क कर सकें।

बस्तर आईजी की दो-टूक चेतावनी

नक्सलियों की घेराबंदी के बीच बस्तर आईजी ने दो दिन पहले ही एक सख्त बयान जारी किया था। उन्होंने बचे हुए माओवादियों को चेतावनी दी है कि वे समय सीमा खत्म होने से पहले आत्मसमर्पण कर दें, अन्यथा उन्हें गंभीर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। पुलिस का मानना है कि नक्सलियों के पास अब न तो कोई ठोस उद्देश्य बचा है और न ही पर्याप्त गोला-बारूद। ऐसे में सुरक्षा बलों का दबाव उन पर भारी पड़ रहा है। अगर आज रात तक कोई बड़ा सरेंडर नहीं होता है, तो पुलिस आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रही है।

जंगलों में पत्रकारों और जनप्रतिनिधियों की कोशिश

नक्सलियों तक सरेंडर का संदेश पहुँचाने के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधि और पत्रकार भी सक्रिय हैं। हालांकि, नक्सलियों के छोटे गुटों में बंटने और उनके लगातार ठिकाने बदलने की वजह से उनसे संपर्क साधना मुश्किल हो रहा है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की तय की गई डेडलाइन अब सिर पर है, ऐसे में पुलिस की रणनीतिक टीमें जंगलों के उन संभावित रास्तों पर नजर रखे हुए हैं जहाँ से ये नक्सली बाहर आ सकते हैं। स्थानीय स्तर पर माहौल पूरी तरह से सरगर्मी भरा बना हुआ है।

दुश्मन से दोस्त बने सुरक्षा बल के जवान

जंगलों से एक ऐसी तस्वीर भी सामने आई जिसने सबको हैरान कर दिया। शनिवार को जब तीन नक्सली आत्मसमर्पण करने के लिए बाहर आए, तो सुरक्षा बल के जवानों ने उन्हें जंगल में ही भोजन करवाया। जो जवान कभी इन नक्सलियों की गोलियों का जवाब दे रहे थे, वे ही उन्हें सुरक्षित बाहर लेकर आए और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली। यह बदलाव नक्सलियों के लिए एक बड़ा संदेश है कि मुख्यधारा में लौटने पर उनके साथ मानवीय व्यवहार किया जाएगा और उन्हें एक नई जिंदगी शुरू करने का पूरा मौका मिलेगा।

अंतिम 52 घंटों में क्या होगा बड़ा फैसला?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांकेर के ये अंतिम 17 नक्सली क्या फैसला लेते हैं। एक तरफ उनके साथियों की भावुक अपील है और दूसरी तरफ पुलिस की सख्त चेतावनी। कांकेर में लगभग सभी नक्सल कमेटियां खत्म हो चुकी हैं और यह संगठन का आखिरी सिरा है। अगर ये नक्सली सरेंडर कर देते हैं, तो कांकेर जिला पूरी तरह से नक्सल मुक्त घोषित हो जाएगा। 31 मार्च की डेडलाइन जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे काउंटडाउन की धड़कनें तेज होती जा रही हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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