
छत्तीसगढ़ के पर्यावरण को सुरक्षित रखने और वन्य क्षेत्रों को प्रदूषण से बचाने के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक बेहद बड़ा और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार के उस नीतिगत निर्णय को पूरी तरह सही ठहराया है जिसके तहत अधिसूचित जंगलों या संरक्षित वन्य क्षेत्रों से हवाई दूरी के 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी इलाकों को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया गया था। हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक आदेश के बाद अब वन क्षेत्रों के इस तय दायरे में आने वाली सभी आरा मिलें पूरी तरह बंद रहेंगी। अदालत ने इस पाबंदी के खिलाफ मिल संचालकों द्वारा दायर की गईं सभी 19 याचिकाओं को एक सिरे से खारिज कर दिया है।
‘हमें दिल्ली जैसा प्रदूषण नहीं चाहिए’, सख्त टिप्पणी के साथ खारिज हुईं याचिकाएं
इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने देश की राजधानी दिल्ली के बिगड़ते पर्यावरण का हवाला देते हुए एक बेहद तल्ख और गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि हमें छत्तीसगढ़ में दिल्ली जैसा दमघोंटू प्रदूषण नहीं चाहिए। प्राकृतिक संपदा और जंगलों को बचाना आने वाली पीढ़ी के लिए बेहद जरूरी है। कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा तय किए गए 10 किलोमीटर के बफर जोन के नियम को पूरी तरह से जनहित और पर्यावरण सुरक्षा के हक में माना। अदालत ने कहा कि औद्योगिक गतिविधियों और पर्यावरण संतुलन के बीच एक स्पष्ट सीमा रेखा होना आवश्यक है, इसलिए इस नियम में किसी भी तरह की ढील नहीं दी जा सकती।
25 सितंबर 2025 की अधिसूचना और वन विभाग की कार्रवाई पर लगी अंतिम मुहर
इस पूरे कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो राज्य सरकार ने 25 सितंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना में छत्तीसगढ़ काष्ठ चिरान (विनियमन) अधिनियम, 1984 की धारा 5(1) के तहत मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए जंगली क्षेत्रों के चारों तरफ 10 किलोमीटर के हिस्से को पूरी तरह प्रतिबंधित क्षेत्र (बफर जोन) घोषित कर दिया गया था। इस नियम के लागू होते ही वन विभाग ने तुरंत कड़ा रुख अपनाते हुए इस दायरे में आने वाली सभी आरा मिलों को सील करने और उनके पुराने लाइसेंसों के नवीनीकरण पर पूरी तरह रोक लगाने के प्रशासनिक आदेश जारी कर दिए थे।
लाइसेंस रिन्यू न होने पर कोर्ट पहुंचे थे मिल संचालक, नहीं मिली कोई राहत
वन विभाग द्वारा आरा मिलों को बंद करने के फरमान और काम ठप होने के बाद प्रभावित मिल संचालकों ने इस सरकारी नीति को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि इस अचानक किए गए फैसले से उनके व्यवसाय और आजीविका पर बुरा असर पड़ रहा है। मिल संचालकों ने अदालत से उनके पुराने लाइसेंसों को रिन्यू करने और मिलें दोबारा खोलने की अनुमति देने की गुहार लगाई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने आर्थिक हितों के मुकाबले पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा को सर्वोपरि माना। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि वनों के संरक्षण के लिए बनाए गए नियमों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा, जिसके बाद मिल संचालकों की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर गया है।
Also Read: डॉ. तीजन बाई के नाम से जाना जाएगा गनियारी का सरकारी स्कूल:गजेन्द्र यादव



