
Al Nino Rain Deficit Farmers Crop: छत्तीसगढ़ में मानसूनी हवाओं के प्रवेश के बावजूद अल-नीनो प्रणालियों के चलते मानसून कमजोर हो गई है जिससे बारिश की बेहद धीमी रफ्तार ने राज्य के किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. जून का महीना खत्म होने को है, लेकिन प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में अब तक उम्मीद के मुताबिक पानी नहीं बरसा है. मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य के ज्यादातर जिलों में इस समय सामान्य से 50 से लेकर 80 प्रतिशत तक कम वर्षा रिकॉर्ड की गई है. इस सूखे जैसे हालात के कारण खेतों में जोताई का काम पूरा होने के बाद भी मिट्टी में इतनी नमी नहीं है कि किसान धान की बोआई का काम शुरू कर सकें.
छत्तीसगढ़ के इन दस प्रमुख जिलों में अच्छी बारिश का इंतजार
बादलों की इस बेरुखी का सीधा असर छत्तीसगढ़ के मुख्य कृषि क्षेत्रों पर दिखने लगा है. सूबे के धमतरी, मुंगेली, जांजगीर-चांपा, बलौदाबाजार, महासमुंद, बिलासपुर, राजनांदगांव सहित बस्तर संभाग के प्रमुख जिलों जैसे सुकमा और बीजापुर के किसान रोज आसमान की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं. इन सभी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धान की खेती की जाती है. कृषि मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि अगले एक सप्ताह के भीतर अच्छी मानसूनी बारिश नहीं होती है, तो इस साल का पूरा फसल चक्र बुरी तरह प्रभावित हो सकता है जिससे पैदावार में भारी गिरावट आएगी.
अल-नीनो के चलते इस साल 10 प्रतिशत तक कम बरसेगा पानी
मौसम और कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक इस साल प्रशांत महासागर में सक्रिय अल-नीनो प्रणालियों के चलते मानसून कमजोर पड़ रहा है. इसके प्रभाव से छत्तीसगढ़ और उससे सटे मध्य भारत के राज्यों में इस सीजन में सामान्य से 8 से 10 प्रतिशत तक कम बारिश होने की प्रबल आशंका है. चूंकि छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था और खेती मुख्य रूप से मानसूनी धान पर निर्भर है, इसलिए यह स्थिति ग्रामीण इलाकों के लिए ठीक नहीं है. इस संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे पारंपरिक धान के बजाय कम दिनों में पकने वाली फसलों की तरफ रुख करें.
कम पानी वाली दलहन और तिलहन फसलों की खेती पर विशेष जोर
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को अपने नुकसान को कम करने के लिए फसल विविधीकरण (फसल बदलने) की नीति अपनाने को कहा है. उनके अनुसार जिन किसानों के खेत ऊंचाई वाले स्थानों पर हैं, वे धान के बदले उड़द, मूंग और अरहर जैसी दालों की बुआई कर सकते हैं. इसके अलावा भर्री और कन्हार जैसी भारी मिट्टी वाले खेतों के लिए तिल, रामतिल, सोयाबीन और मूंगफली की खेती को सबसे मुफीद और सुरक्षित माना गया है. इन फसलों को बढ़ने के लिए बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है जिससे सूखे की स्थिति में भी लागत वसूल हो जाती है.
कृषि एक्सपर्ट्स ने जारी की गाइडलाइन, किसानों को दी ये महत्वपूर्ण सलाह
संकट के इस दौर में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने किसानों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं. उन्होंने कहा है कि किसान किसी भी हाल में सूखे खेतों में बोआई की जल्दबाजी न करें और मिट्टी में पर्याप्त गीलापन होने पर ही बीज डालें. इसके साथ ही कम अवधि में तैयार होने वाली धान की प्रमाणित किस्मों का ही चयन करें. सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रोत्साहन योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाएं. इसके अलावा मौसम के इस बड़े जोखिम से सुरक्षित रहने के लिए सभी किसान भाई अपनी खड़ी फसलों का प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत रजिस्ट्रेशन जरूर करा लें.
सरकार देगी प्रति एकड़ 15 हजार रुपये की भारी आर्थिक सहायता
कृषि महाविद्यालय रायपुर के डीन डॉ. जीके दास ने बताया कि छत्तीसगढ़ में मानसून की अनिश्चितता के कारण अक्सर सूखे के अलग-अलग चरण देखने को मिलते हैं. यदि आने वाले दिनों में मानसूनी सिस्टम मजबूत होता है तो स्थिति में सुधार की गुंजाइश बनी हुई है. उन्होंने कहा कि अल-नीनो के खतरे को देखते हुए राज्य सरकार भी किसानों की मदद के लिए आगे आई है. जो किसान धान के बदले अपने खेतों में दलहन, तिलहन या अन्य वैकल्पिक फसलें लगाएंगे, उन्हें सरकार की तरफ से प्रति एकड़ 15,000 रुपये की नकद प्रोत्साहन राशि दी जाएगी ताकि उनका आर्थिक नुकसान न हो.
यहाँ छत्तीसगढ़ में वर्तमान मानसूनी स्थिति और कृषि विभाग द्वारा जारी किए गए मुख्य आंकड़ों की पूरी जानकारी दी गई है:
| वर्तमान स्थिति और चुनौतियां | कृषि वैज्ञानिकों की सलाह | सरकारी सहायता और लाभ |
| अधिकांश जिलों में 50 से 80% कम बारिश हुई | कम अवधि में पकने वाली धान की किस्मों को चुनें | धान के बदले दलहन-तिलहन लगाने पर ₹15,000 प्रति एकड़ मदद |
| अल-नीनो के कारण कुल 10% कम वर्षा का अनुमान | ऊंचाई वाले खेतों में उड़द, मूंग और अरहर की बुआई करें | प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से फसलों का कवरेज कराएं |
| खेतों में पर्याप्त नमी न होने से बोआई का काम अटका | भारी मिट्टी वाले क्षेत्रों में तिल, सोयाबीन और मूंगफली को चुनें | सरकारी सोसायटियों से प्रमाणित बीजों का ही उठाव करें |



