
Pandwani Singer Teejan Bai: छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को अपनी बुलंद आवाज के दम पर पूरी दुनिया में एक अलग पहचान दिलाने वाली सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई की अंतिम धार्मिक रस्में पूरी कर ली गई हैं। सोमवार को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज स्थित पवित्र त्रिवेणी संगम के तट पर उनका अस्थि विसर्जन पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हुआ। पद्मविभूषण से सम्मानित इस महान लोक कलाकार के अंतिम सफर के इस खास मौके पर उनके परिवार के चुनिंदा सदस्य, बेहद करीबी रिश्तेदार और कुछ पुराने शुभचिंतक ही शामिल हुए जिन्होंने नम आंखों से अपनी इस प्रिय कला शिरोमणि को अंतिम विदाई दी।
प्रयागराज के पवित्र त्रिवेणी संगम में वैदिक रीति-रिवाज से विसर्जित की गईं अस्थियां
सनातन धर्म की पुरानी मान्यताओं के अनुसार किसी भी व्यक्ति की आत्मा की पूर्ण शांति के लिए प्रयागराज के संगम तट को सबसे उत्तम माना जाता है। इसी आस्था का सम्मान करते हुए तीजन बाई के परिजनों ने संगम के पवित्र जल में उनकी अस्थियों को प्रवाहित किया। विसर्जन से पहले घाट पर मौजूद तीर्थ पुरोहितों ने पूरे वैदिक मंत्रोचार के साथ विशेष पूजा-अर्चना संपन्न कराई। इसके बाद परिवार के लोगों ने श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए ईश्वर से उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान देने की प्रार्थना की।
छत्तीसगढ़ की माटी की अनूठी कला पंडवानी को वैश्विक मंच पर दिलाई थी नई पहचान
तीजन बाई केवल एक साधारण गायिका नहीं थीं बल्कि वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान की सबसे बड़ी संवाहक थीं। उन्होंने अपना पूरा जीवन महाभारत की कथाओं पर आधारित पंडवानी लोककला को समर्पित कर दिया था। अपने हाथ में तंबूरा लेकर जब वे रौद्र रूप में मंच पर खड़ी होकर दुर्योधन वध या कीचक वध का प्रसंग गाती थीं तो सामने बैठी हजारों की भीड़ मंत्रमुग्ध हो जाती थी। अपनी इसी ठेठ देसी और प्रभावशाली गायन शैली के बल पर उन्होंने छत्तीसगढ़ के गांवों से निकलकर लंदन, पेरिस और न्यूयॉर्क जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी कला का परचम लहराया था।
कला और संस्कृति जगत में अपूरणीय क्षति, नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए रहेंगी हमेशा मार्गदर्शक
उनके शांत होने की खबर मिलते ही न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश के सांस्कृतिक और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई थी। अस्थि विसर्जन के मौके पर पहुंचे वरिष्ठ लोगों और कला प्रेमियों ने भावुक होते हुए कहा कि तीजन बाई का पूरा जीवन संघर्ष और सफलता की एक अद्भुत मिसाल है। समाज के कड़े विरोध के बावजूद उन्होंने लोककला का दामन कभी नहीं छोड़ा। उनका यह जुझारू व्यक्तित्व और कला के प्रति अटूट समर्पण आने वाले समय में नई पीढ़ी के तमाम युवा कलाकारों के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक और प्रेरणा का बड़ा स्रोत बना रहेगा।
भले ही सांसों का सफर थम गया पर इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगी उनकी विरासत
संगम तट पर मौजूद परिवार के सदस्यों ने कहा कि तीजन बाई आज शारीरिक रूप से भले ही हमारे बीच मौजूद नहीं हैं लेकिन उनकी दमदार आवाज और लोक संस्कृति के प्रति उनका किया गया त्याग हमेशा जीवित रहेगा। वे भारत की उन चुनिंदा महिलाओं में शामिल थीं जिन्हें देश के तीनों बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण से नवाजा गया था। पंडवानी को विश्व पटल पर स्थापित करने में उनके द्वारा दिए गए ऐतिहासिक योगदान को भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में हमेशा बहुत ही आदर और स्वर्ण अक्षरों के साथ याद किया जाएगा।
छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन दी गई ऐतिहासिक और सबसे लंबी श्रद्धांजलि
इधर राजधानी रायपुर में चल रहे छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन का नजारा भी बेहद भावुक और गरिमामय रहा। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही अध्यक्ष ने प्रदेश की इस महान विभूति के अवसान की जानकारी साझा की। इसके बाद पूरी विधानसभा ने एक सुर में तीजन बाई को अपनी गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की। सदन के भीतर लगभग 30 मिनट से भी अधिक समय तक केवल तीजन बाई के व्यक्तित्व पर चर्चा होती रही जो कि हाल के इतिहास में किसी भी दिवंगत हस्ती को दी गई सबसे लंबी और ऐतिहासिक श्रद्धांजलि है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायकों ने नम आंखों से याद किए तीजन बाई से जुड़े पुराने संस्मरण
इस शोक प्रस्ताव के दौरान राजनीति की तमाम दीवारें पूरी तरह ढह गईं। सत्ता पक्ष के मंत्रियों से लेकर विपक्ष के तमाम सीनियर विधायकों ने एक स्वर में तीजन बाई के सामाजिक और सांस्कृतिक योगदान को याद किया। कई विधायकों ने तो भावुक होते हुए तीजन बाई के साथ बिताए गए अपने पुराने दिनों के संस्मरण भी सदन के पटल पर साझा किए। सभी नेताओं ने एक सुर में स्वीकार किया कि तीजन बाई ने अपनी कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ राज्य का नाम पूरे विश्व में इतना ऊंचा कर दिया है जिसकी भरपाई आने वाले कई दशकों तक कर पाना मुमकिन नहीं होगा।



