CG Hasdeo Aranya Coal Block: छत्तीसगढ़ में नए कोल ब्लॉक की मंजूरी से बढ़ा विवाद: राम वन गमन पथ और जानकी रसोई के अस्तित्व पर संकट, आदिवासियों का विरोध तेज

CG Hasdeo Aranya Coal Block: छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में एक नए कोयला ब्लॉक को हरी झंडी मिलने के बाद सियासी और सामाजिक माहौल एक बार फिर गरमा गया है। स्थानीय निवासियों और पर्यावरणविदों का कहना है कि इस खनन परियोजना के शुरू होने से भगवान श्री राम की पौराणिक स्मृतियों पर सीधा संकट मंडराने लगा है। दावों के मुताबिक, खदान के दायरे में आने के कारण त्रेतायुग का राम वन गमन पथ प्रभावित होगा और माता सीता से जुड़ी जानकी रसोई का अस्तित्व भी पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। इस नए कोल ब्लॉक के संचालन का जिम्मा अडानी समूह के पास है, जिसके कारण अब इस पूरे मामले को लेकर नीतिगत और धार्मिक स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।

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केंद्र सरकार से हरी झंडी मिलते ही हसदेव में सुलगने लगी विरोध की आग, पौराणिक स्थलों को बचाने की उठी मांग

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा छत्तीसगढ़ में नई कोयला खदान को अंतिम मंजूरी दिए जाने के बाद से ही हसदेव क्षेत्र में रहने वाले लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। इस परियोजना का व्यावसायिक उत्तरदायित्व अडानी समूह को सौंपा गया है। मंजूरी मिलने के बाद यह बात सामने आ रही है कि खनन क्षेत्र की जद में आने से ऐतिहासिक रामगढ़ की पहाड़ियां, प्राचीन नाट्यशाला, सीता गुफा और जानकी रसोई जैसे बेहद महत्वपूर्ण पौराणिक स्थल नष्ट होने की कगार पर पहुंच जाएंगे। स्थानीय लोगों का मानना है कि केवल व्यावसायिक फायदे के लिए इन प्राचीन धरोहरों को दांव पर लगाया जा रहा है।

त्रेतायुग के ऐतिहासिक चिन्हों पर मंडराया खतरा, धमाकों और भारी मशीनों की गूंज से प्रभावित होंगे राम के पदचिन्ह

धार्मिक मान्यताओं और शोध के अनुसार, भगवान श्री राम ने अपने 14 वर्षों के वनवास काल का एक लंबा और महत्वपूर्ण समय छत्तीसगढ़ के जंगलों में व्यतीत किया था। हसदेव और सरगुजा रेंज के इन इलाकों में प्रभु राम के आगमन से जुड़े कई पुरातात्विक और धार्मिक साक्ष्य आज भी जीवंत रूप में मौजूद हैं। इनमें वह पावन स्थान भी शामिल है जहां माता सीता वनवास के दौरान भोजन तैयार करती थीं। जानकारों का कहना है कि कोल माइनिंग के लिए होने वाले भारी विस्फोटों और खुदाई के काम से ये तमाम ऐतिहासिक पदचिन्ह हमेशा के लिए जमींदोज हो जाएंगे।

मध्य भारत के लंग्स जोन में शुरू होगी खुदाई, करीब 1742 हेक्टेयर घने जंगल की जमीन का बदला गया स्वरूप

छत्तीसगढ़ सरकार ने केते एक्सटेंशन ओपन कास्ट कोल माइनिंग और पिट हेड कोल वॉशरी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए 1742.60 हेक्टेयर समृद्ध वन भूमि को गैर-वन उपयोग में स्थानांतरित करने की अनुमति दी है। राज्य सरकार से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे अंतिम स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा गया था, जहां से अब इसे हरी झंडी मिल चुकी है। इस मंजूरी के साथ ही मध्य भारत के ‘लंग्स जोन’ (फेफड़े) कहे जाने वाले इस बेहद घने जंगल में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।

सात लाख से अधिक पेड़ों पर चलेगी आरी, पर्यावरण के संतुलन और मौसम चक्र पर पड़ेगा इसका सीधा असर

वन विभाग के अनुमान के मुताबिक, इस नई खदान को पूरी तरह चालू करने के लिए हसदेव अरण्य क्षेत्र के लगभग 7 लाख से अधिक हरे-भरे पेड़ों को काटा जाएगा। इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई को लेकर पर्यावरणविद गहरी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस इलाके की सघन हरियाली ही पूरे प्रदेश के मौसम चक्र को नियंत्रित रखती है। यदि इतने बड़े पैमाने पर जंगल को साफ किया गया, तो क्षेत्र का भूजल स्तर गिरने के साथ ही पूरे छत्तीसगढ़ के पर्यावरणीय संतुलन पर इसका बेहद बुरा और स्थाई असर पड़ेगा।

कांग्रेस ने सरकार की खनन नीतियों को घेरा, कहा आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को कुचला जा रहा है

इस संवेदनशील मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता वंदना राजपूत ने कहा कि सरकार की नीतियां पूरी तरह कॉरपोरेट परस्त हैं और सरगुजा रेंज की कीमती संपदा को निजी हाथों में सौंपने के लिए नियम-कायदों को ताक पर रखा जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरा क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां स्थानीय ग्राम सभाओं की सहमति के बिना कोई भी बड़ा प्रोजेक्ट शुरू नहीं किया जा सकता। सरकार आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी कर रही है।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के बैनर तले एकजुट हुए ग्रामीण, जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए महीनों से जारी है धरना

इस खनन परियोजना के विरोध में ‘छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन’ के नेतृत्व में दर्जनों गांवों के आदिवासी समुदाय के लोग पिछले कई महीनों से लगातार धरने पर बैठे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि इस बेहद संवेदनशील जैव विविधता वाले क्षेत्र में माइनिंग होने से उनके पारंपरिक जल स्रोत सूख जाएंगे और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन यानी वनोपज पूरी तरह छिन जाएगा। कई ग्राम सभाओं ने इस प्रोजेक्ट के खिलाफ बकायदा आधिकारिक विरोध प्रस्ताव भी पारित किए हैं, लेकिन शासन स्तर पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी मंडराया संकट, हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ सकता है खूनी संघर्ष

जंगल कटने का सीधा असर केवल इंसानों और पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि वहां रहने वाले बेजुबान वन्यजीवों पर भी पड़ने वाला है। हसदेव अरण्य का यह इलाका हाथियों का एक प्रमुख और प्राकृतिक कॉरिडोर माना जाता है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि खदानों के विस्तार और पेड़ों के कटने से हाथियों का सुरक्षित ठिकाना उजड़ जाएगा। अपना आशियाना नष्ट होने के कारण हाथी रिहायशी गांवों की तरफ रुख करेंगे, जिससे आने वाले दिनों में सरगुजा और आस-पास के जिलों में मानव-हाथी द्वंद्व और अधिक हिंसक रूप ले सकता है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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