
छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित ‘रामावतार जग्गी हत्याकांड’ में बिलासपुर हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को हत्या और आपराधिक साजिश का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई की अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के उस फैसले को पूरी तरह पलट दिया, जिसमें अमित जोगी को बरी कर दिया गया था। इस फैसले के बाद प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है और अमित जोगी के पास अब आत्मसमर्पण के अलावा बहुत सीमित विकल्प बचे हैं।

22 साल बाद मिला न्याय: हाईकोर्ट ने अमित जोगी को ठहराया हत्या का दोषी
बिलासपुर हाईकोर्ट ने अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी पाया है। उम्रकैद के साथ ही उन पर 1000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना न भरने की स्थिति में उन्हें 6 महीने की अतिरिक्त सश्रम जेल काटनी होगी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब एक ही गवाही और सबूतों के आधार पर अन्य 28 सह-आरोपियों को सजा दी गई थी, तो मुख्य साजिशकर्ता को बरी करना कानूनी रूप से गलत और असंगत था।
4 जून 2003 की वो रात: जब गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा था रायपुर
यह पूरा मामला 4 जून 2003 का है, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कद्दावर नेता और कोषाध्यक्ष रामावतार जग्गी की रायपुर में सरेराह गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की सरकार थी और इस हत्याकांड ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। रामावतार जग्गी पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी माने जाते थे। शुक्ल के कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में जाने पर जग्गी भी उनके साथ चले गए थे, जिसके बाद यह हत्या एक गहरी राजनीतिक साजिश के रूप में सामने आई।
11 हजार पन्नों की चार्जशीट: सीबीआई ने कोर्ट में पेश किए पुख्ता सबूत
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जब यह मामला दोबारा खुला, तो जांच एजेंसी सीबीआई ने कोर्ट के सामने 11 हजार पन्नों की विस्तृत चार्जशीट पेश की। इस रिपोर्ट में हत्या की साजिश से जुड़े डिजिटल साक्ष्य, गवाहों के बयान और कॉल रिकॉर्ड्स शामिल थे। जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने शुरू से ही आरोप लगाया था कि यह हत्या तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित थी और प्रभाव का इस्तेमाल कर सबूतों को मिटाने की कोशिश की गई थी। हाईकोर्ट ने सीबीआई की दलीलों को स्वीकार करते हुए माना कि अमित जोगी इस पूरी साजिश के केंद्र में थे।
तीन हफ्ते में सरेंडर का आदेश: हाईकोर्ट ने अमित जोगी को दिया सख्त निर्देश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अमित जोगी को किसी भी तरह की तुरंत राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने उन्हें आदेश दिया है कि वे तीन सप्ताह के भीतर पुलिस या अदालत के समक्ष सरेंडर करें। इस सख्त रुख के बाद अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर फिलहाल कोई स्टे नहीं लगाया है, लेकिन मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। अब 20 अप्रैल को देश की सबसे बड़ी अदालत में इस पर अहम सुनवाई होनी है।

कौन थे रामावतार जग्गी: राजनीति और व्यापार में रखते थे बड़ा रसूख
रामावतार जग्गी केवल एक नेता ही नहीं, बल्कि एक सफल कारोबारी भी थे। अविभाजित मध्य प्रदेश और फिर छत्तीसगढ़ की राजनीति में उनका कद काफी बड़ा था। वे विद्याचरण शुक्ल के ‘राइट हैंड’ माने जाते थे। जब शुक्ल ने कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी का दामन थामा, तो जग्गी ने प्रदेश में पार्टी के संगठन और खजाने को संभालने की जिम्मेदारी उठाई थी। उनकी हत्या ने न केवल एक परिवार को उजाड़ा, बल्कि छत्तीसगढ़ की तत्कालीन राजनीति की दिशा भी बदल दी थी।
गद्दारी और गवाह: बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह ने खोले थे राज
इस हाई-प्रोफाइल मर्डर केस में कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह सरकारी गवाह बन गए थे। उनकी गवाही ने साजिश की परतों को खोलने में मदद की थी। साल 2007 में रायपुर की विशेष अदालत ने 28 आरोपियों को तो सजा सुना दी थी, लेकिन मुख्य आरोपी के तौर पर चिह्नित अमित जोगी को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी कर दिया गया था। अब हाईकोर्ट ने उसी ‘संदेह’ को खत्म कर सजा का ऐलान किया है।
दोषियों की लंबी फेहरिस्त: याह्या ढेबर और फिरोज सिद्दीकी समेत कई नाम शामिल
जग्गी हत्याकांड में शामिल अपराधियों की सूची काफी लंबी है। इसमें अभय गोयल, याह्या ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, और सूर्यकांत तिवारी जैसे नाम शामिल हैं। इन सभी को पहले ही उम्रकैद की सजा मिल चुकी है। हाईकोर्ट ने अपने ताजा फैसले में इन सभी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है और अमित जोगी को भी इसी श्रेणी में शामिल कर दिया है। कोर्ट ने माना कि यह एक संगठित अपराध था जिसे अंजाम देने के लिए पूरी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में 20 अप्रैल को महामुकाबला: सिब्बल और रोहतगी पेश करेंगे दलीलें
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अमित जोगी की ओर से देश के दिग्गज वकीलों की फौज खड़ी की गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी और विवेक तन्खा सुप्रीम कोर्ट में जोगी का पक्ष रख रहे हैं। उनकी दलील है कि हाईकोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया और उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं दिया। अब सबकी नजरें 20 अप्रैल की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि अमित जोगी को जेल जाना होगा या उन्हें कोई राहत मिलेगी।

न्याय की जीत: सतीश जग्गी की 22 साल की तपस्या लाई रंग
रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी के लिए यह फैसला किसी बड़ी जीत से कम नहीं है। उन्होंने अपने पिता के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए रायपुर से लेकर दिल्ली तक की अदालतों के चक्कर लगाए। सतीश जग्गी ने हाईकोर्ट में तर्क दिया था कि सत्ता के प्रभाव में साक्ष्य मिटाए गए थे, इसलिए केवल भौतिक सबूतों के आधार पर आरोपियों को छोड़ना न्याय के साथ मजाक होगा। हाईकोर्ट के फैसले ने उनके इस विश्वास को पुख्ता किया है कि अपराधी कितना भी रसूखदार क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है।



