
बस्तर के सुकमा जिले में दशकों बाद एक पुरानी और पवित्र परंपरा फिर से अपने असली स्वरूप में लौट आई है। जगरगुंडा जैसे घोर नक्सल प्रभावित इलाकों में जब किसानों के घर धान की नई फसल आती है, तो अब उसका पहला अंश देवी-देवताओं के चरणों में अर्पित किया जा रहा है। लंबे समय तक खौफ के साये में जीने वाले आदिवासियों के लिए यह बदलाव किसी उत्सव से कम नहीं है। अब ग्रामीण अपनी मेहनत की कमाई का उपयोग खुद के परिवार और गांव के विकास के लिए कर पा रहे हैं, जो पहले मुमकिन नहीं था।
खत्म हुआ ‘लाल टैक्स’ का डर
एक दौर था जब बस्तर के इन अंदरूनी इलाकों में नक्सलियों का समानांतर शासन चलता था। ग्रामीणों को अपनी फसल, मवेशी और जमीन के हिसाब से नक्सलियों को हिस्सा देना पड़ता था, जिसे ‘लाल टैक्स’ कहा जाता था। परंपरा के अनुसार फसल का जो पहला भाग भगवान के लिए निकलना चाहिए था, उसे मजबूरी में नक्सलियों के ‘पीएलजीए’ कैडर्स के लिए अलग रखना पड़ता था। सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी और नक्सलियों के आर्थिक नेटवर्क के कमजोर होने से अब आदिवासियों को इस जबरन वसूली से बड़ी राहत मिली है।
लौट आई खुशहाली और आस्था
नक्सली दहशत कम होने से बस्तर अंचल की सांस्कृतिक जड़ें फिर से मजबूत हो रही हैं। आदिवासियों में अब यह भरोसा जगा है कि उनकी उपज पर उनका अपना हक है। जगरगुंडा और आसपास के क्षेत्रों में अब फसल कटाई के बाद होने वाले पारंपरिक त्योहारों में वही पुरानी रौनक दिखने लगी है। ग्रामीण अब बिना किसी डर के अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन कर रहे हैं। इस बदलाव ने न केवल इलाके की अर्थव्यवस्था को सुधारा है, बल्कि सालों से दबी हुई आस्था को भी नया जीवन दिया है।



